राज्यसभा में 2/3 बहुमत से मोदी सरकार को असीम शक्तियां!

      भारतीय राजनीति में 18 जून 2026 की तारीख एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। देश के 12 राज्यों में राज्यसभा की 26 सीटों पर होने वाले चुनाव केवल सांख्यिकीय फेरबदल नहीं हैं, बल्कि ये उस संवैधानिक भविष्य की नींव रख सकते हैं जिसे भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन वर्षों से आकार देने की कोशिश कर रहा है। इन चुनावों के बाद राज्यसभा में एनडीए का आंकड़ा 150 के पार पहुंचने की उम्मीद है, जो उसे दो-तिहाई बहुमत के और करीब ले जाएगा।राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत का अर्थ केवल संख्या बल नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 में यह साफ किया गया है कि किसी भी संविधान संशोधन को संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में विशेष बहुमत से पारित होना अनिवार्य है। इस विशेष बहुमत का मतलब उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन से होता है। यही वह कुंजी है जो संविधान के उन दरवाजों को खोल सकती है जो अब तक बंद थे। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का मामला सबसे पहले और सबसे अधिक चर्चित है। संविधान के 130वें संशोधन विधेयक को लोकसभा से संयुक्त संसदीय समिति को भेजे जाने की संस्तुति मिलने के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में इस बिल को सभा पटल के सामने रखा था, लेकिन सरकार के पास संवैधानिक संशोधन को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत नहीं था। अप्रैल 2026 में संसद के विशेष सत्र में लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन बिल पर चर्चा हुई, लेकिन इसे पारित कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी, जो सरकार को नहीं मिल सकी। अब यदि 18 जून के बाद राज्यसभा में बहुमत का गणित बदलता है तो यह विधेयक मानसून सत्र में फिर से जीवित हो सकता है।

      इससे जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को मानसून सत्र में फिर से पेश करने के लिए भाजपा की योजना 18 जून को राज्यसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद द्रमुक समेत कुछ अन्य ऐसे विपक्षी दलों को साधने की है। भाजपा को तीन कारणों से संविधान संशोधन विधेयक पर आगे बढ़ने का हौसला मिला है। पहला, राज्यसभा में बहुमत के करीब पहुंचना; दूसरा, तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल में टूट की संभावना; और तीसरा, द्रमुक और भाजपा के बीच बढ़ती करीबी।महिला आरक्षण के साथ ही परिसीमन का मुद्दा भी गहराई से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं, जो 1977 के बाद से स्थिर हैं। इंदिरा सरकार ने परिसीमन लाकर सीटें 525 से बढ़ाकर 543 कर इसे फ्रीज कर दिया था। अब जनसंख्या के अनुपात में लोकसभा की सीटें बढ़ाने और उनमें महिलाओं के लिए आरक्षण तय करने के लिए एक साथ संविधान संशोधन जरूरी है। दक्षिण भारतीय राज्यों को चिंता है कि नई सीटों का बंटवारा उत्तर भारत के पक्ष में होगा क्योंकि वहां जनसंख्या अधिक है। इसीलिए पीएम मोदी को यह आश्वासन देना पड़ा कि परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा।

     समान नागरिक संहिता भाजपा के घोषणापत्र का वह वादा है जो दशकों से लंबित है। उत्तराखंड इसे लागू करने वाला पहला राज्य बन चुका है। केंद्र में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए संविधान में संशोधन अनिवार्य नहीं है, लेकिन इसके कुछ पहलू जैसे मुस्लिम व्यक्तिगत कानून को प्रभावित करने वाले प्रावधान विधायी और सांख्यिकीय दृष्टि से संवेदनशील हैं। राज्यसभा में मजबूत बहुमत मिलने के बाद सरकार के लिए इस दिशा में आगे बढ़ना राजनीतिक रूप से कहीं आसान हो जाएगा। न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया भी एक ऐसा क्षेत्र है जहां मोदी सरकार लंबे समय से बदलाव चाहती है। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 में असंवैधानिक करार दे दिया था। सरकार और न्यायपालिका के बीच न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका को लेकर वर्षों से टकराव चल रहा है। राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के बाद सरकार एक बार फिर इस दिशा में संविधान संशोधन लाने का साहस जुटा सकती है। अनुच्छेद 356 अर्थात् राष्ट्रपति शासन की शर्तों को लेकर भी समय-समय पर संशोधन की मांग उठती रही है। इसी प्रकार संपत्ति के अधिकार, भूमि अधिग्रहण कानून और अनुच्छेद 31 से जुड़े पुराने विवाद हैं, जिन पर सरकार नए सिरे से नीति बना सकती है। आर्थिक नीतियों को अधिक लचीला बनाने के लिए संविधान की नौवीं अनुसूची में संशोधन भी एक विकल्प है, जिसमें कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखा जाता है।

      हालांकि यह समझना जरूरी है कि राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत अकेले पर्याप्त नहीं है। किसी भी संविधान संशोधन को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विशेष बहुमत से पारित होना अनिवार्य है। लोकसभा में विधेयक पारित कराने के लिए समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस या द्रमुक में से कम से कम दो मुख्य विपक्षी दलों को मतदान से अनुपस्थित रहना होगा। कुछ संवेदनशील संशोधनों के लिए राज्य विधानसभाओं के अनुमोदन की भी जरूरत होती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 18 जून के चुनाव परिणाम केवल राज्यसभा की सीटों का हिसाब-किताब नहीं करेंगे, बल्कि भारत के संवैधानिक भविष्य की दिशा भी तय करेंगे। यदि एनडीए दो तिहाई बहुमत के करीब पहुंच गया और साथ ही कुछ विपक्षी दलों का सहयोग मिल गया, तो ऐसे संशोधन, जो वर्षों से राजनीतिक बहस का हिस्सा थे, कानूनी हकीकत बन सकते हैं। यही कारण है कि विपक्षी दल इन चुनावों को असाधारण महत्व दे रहे हैं और हर वोट को बचाने की पूरी कोशिश में जुटे हैं। 

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

*