सर्बिया से नेपालः एक जैसी पटकथा के बाद अब निशाने पर भारत

संजय सक्सेना

     भारत में आज जिस तरह से कॉकरोच जनता पार्टी, वामपंथी और इंडी गठबंधन कथित रूप से चुनाव में धांधली को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ लामबंद हैं, ऐसा कई देशों में पहले भी हो चुका है। दरअसल, यह सब सुनियोजित होता है, जिसके पीछे अक्सर कई बड़े देशों की सरकारों से लेकर अपने हित साधने में लगे विदेशी उद्योगपति तक शामिल होते हैं। अपनी कोशिशों को अंजाम देने के लिए ये ताकतें हर देश में हालात ऐसे बना देती हैं कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारों को इस्तीफा देना या सत्ता छोड़कर भागना तक पड़ जाता है। वर्तमान वैश्विक भू-राजनीति में किसी भी देश को अस्थिर करने या वहाँ अपनी पसंद की सरकार स्थापित करने के लिए सीधे सैन्य आक्रमण के बजाय एक नया और बेहद खतरनाक हथियार अपनाया जा रहा है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक हाइब्रिड वॉरफेयर या कलर रेवोल्यूशन (रंगीन क्रांतियाँ) कहते हैं। इस रणनीति का सबसे पहला और बुनियादी कदम होता है, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार की वैधता को समाप्त करने के लिए कभी शिक्षा में खामियाँ बताकर तो कभी चुनावी धांधली का एक सुनियोजित नैरेटिव गढ़ा जाता है। भारत जैसे परिपक्व लोकतंत्र में भी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और चुनावी प्रक्रिया पर समय-समय पर उठाए जाने वाले सवाल इसी वैश्विक टूलकिट का हिस्सा माने जाते हैं। लेकिन भारत से पहले, यह खेल दुनिया के कई देशों में सफलतापूर्वक खेला जा चुका है, जहाँ इसके चलते बड़े पैमाने पर अराजकता फैली और चुनी हुई सरकारें उखाड़ फेंकी गईं।

     इस पूरी प्रक्रिया, इसके पीछे काम करने वाली ताकतों, फंडिंग के स्रोतों और प्रभावित देशों का एक विस्तृत व गहन विश्लेषण किया जाए, तो पता चलता है कि भारत से पहले भी कई देशों में ऐसा नैरेटिव गढ़ा जा चुका है। इतिहास गवाह है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद, विशेष रूप से पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया में, इस फॉर्मूले का बार-बार इस्तेमाल किया गया। वर्ष 2000 में सर्बिया में बुलडोजर रेवोल्यूशन में राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोसेविच के खिलाफ विपक्ष ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। बड़े पैमाने पर जनआंदोलन खड़ा किया गया और मिलोसेविच को सत्ता छोड़नी पड़ी। 2003 में जॉर्जिया में रोज रेवोल्यूशन (गुलाबी क्रांति) के द्वारा संसदीय चुनावों में धांधली के आरोपों को हवा दी गई। जनता को सड़कों पर उतारा गया और राष्ट्रपति एडुआर्ड शेवार्डनाद्ज़े को इस्तीफा देने पर मजबूर किया गया। 2004 में यूक्रेन में ऑरेंज रेवोल्यूशन (नारंगी क्रांति) के द्वारा राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को धांधली बताकर खारिज कर दिया गया। भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद सुप्रीम कोर्ट से चुनाव रद्द कराया गया और पश्चिम-समर्थक विक्टर युशचेंको सत्ता में आए। 2005 में किर्गिस्तान में ट्यूलिप रेवोल्यूशन हुआ, जिसमें यहाँ भी संसदीय चुनावों में धांधली का नैरेटिव तैयार कर राष्ट्रपति असकर अकायेव की सत्ता का तख्तापलट कर दिया गया। इसी तरह से 2024 में बांग्लादेश में भी चुनाव के बहिष्कार और धांधली के वैश्विक नैरेटिव को इस कदर हवा दी गई कि अंततः तख्तापलट जैसी अराजक स्थितियाँ उत्पन्न हुईं।

     नेपाल में सितंबर 2025 में हुआ जेन-जी आंदोलन भी ऐसी ही घटना थी, जिसने दशकों पुरानी राजनीतिक व्यवस्था और पारंपरिक नेताओं को हिलाकर रख दिया। आंदोलन का मुख्य तात्कालिक कारण 4 सितंबर 2025 को तत्कालीन सरकार द्वारा फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, यूट्यूब और एक्स समेत 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगाया गया प्रतिबंध था। युवाओं ने इसे अपनी डिजिटल स्वतंत्रता पर सीधा हमला माना। युवाओं के इस प्रचंड आक्रोश के आगे झुकते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली और गृह मंत्री रमेश लेखक सहित कई कैबिनेट मंत्रियों को 9 सितंबर 2025 को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा। इस प्रकार के नैरेटिव और अराजकता के पीछे कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरा ग्लोबल इकोसिस्टम काम करता है। इसमें मुख्य रूप से विदेशी खुफिया एजेंसियाँ और सरकारें शामिल होती हैं। पश्चिमी देशों की कुछ खुफिया एजेंसियाँ और नीति-निर्माता (जैसे अमेरिका और उसके नाटो सहयोगी) अपने भू-राजनीतिक हितों को साधने के लिए अन्य देशों में प्रजातंत्र की रक्षा के नाम पर दखल देते हैं और सरकारें बदल देते हैं। अंतरराष्ट्रीय डीप स्टेट, वैश्विक हथियारों के सौदागर, तेल और ऊर्जा क्षेत्र के बड़े कॉरपोरेट्स और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हर उस देश में अपनी पसंद की सरकारें चाहती हैं, जो उनके व्यापारिक हितों को बिना किसी बाधा के पूरा होने दें। इसके लिए विदेशी फंडेड एनजीओ और थिंक-टैंक, कई मानवाधिकार और डेमोक्रेसी प्रमोशन से जुड़े संगठन जमीनी स्तर पर असंतोष भड़काने और सरकार-विरोधी भावनाओं को हवा देने का काम करते हैं। वहीं, वैश्विक मीडिया और टूलकिट एक्टिविस्ट, अंतरराष्ट्रीय मीडिया घराने (जैसे कुछ प्रमुख अमेरिकी और ब्रिटिश मीडिया संस्थान) और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स मिलकर धांधली के झूठे दावों को एक वैश्विक सच के रूप में स्थापित करते हैं।

      इन आंदोलनों के लिए पैसा कहाँ से आता है? यह बात किसी से छिपी नहीं है। लाखों लोगों को हफ्तों तक सड़कों पर बिठाना, टेंट लगाना, भोजन की व्यवस्था करना, पोस्टर-बैनर छपवाना और सोशल मीडिया पर पेड कैंपेन चलाना बेहद खर्चीला काम है। इसके लिए फंडिंग मुख्य रूप से विदेशी सरकारी ग्रांट्स से आती है। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा वित्तपोषित राष्ट्रीय लोकतंत्र बंदोबस्ती या राष्ट्रीय लोकतंत्र कोष जैसी संस्थाएँ सीधे या परोक्ष रूप से इन देशों के नागरिक समाज समूहों को करोड़ों डॉलर का फंड देती हैं। ग्लोबल परोपकारी और जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन जैसी संस्थाओं पर अक्सर यह आरोप लगता है कि वे कई देशों में राष्ट्रवाद और संप्रभु सरकारों के खिलाफ काम करने वाले स्थानीय एनजीओ और वामपंथी एक्टिविस्टों को भारी-भरकम फंडिंग मुहैया कराती हैं। वित्तीय खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, ऐसे आंदोलनों में कानून की नजर से बचने के लिए हवाला नेटवर्क, बेनामी विदेशी खातों और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए पैसा ट्रांसफर किया जाता है।अराजकता फैलाने और सत्ता बदलने का टूलकिट मॉडस ऑपरेंडी बहुत सावधानी से काम करता है। पहले चरण में, चुनाव से कई महीने पहले ही ईवीएम, चुनाव आयोग और न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाते हैं। इसके बाद चरण दो में सोशल मीडिया, डीपफेक और चुनिंदा फेक न्यूज के जरिए जनता के एक बड़े हिस्से में यह धारणा बैठा दी जाती है कि अगर मौजूदा सरकार दोबारा जीती, तो वह केवल धांधली से ही जीत सकती है। चरण तीन में चुनाव के नतीजों के तुरंत बाद, बिना किसी कानूनी सबूत के, विपक्ष और विदेशी फंडेड छात्र-संगठन सड़कों पर उतर आते हैं। संसद, राष्ट्रपति भवन या प्रधानमंत्री आवास के घेराव जैसी हिंसक परिस्थितियाँ पैदा की जाती हैं। चरण चार में वैश्विक मीडिया इसे लोकतंत्र की पुकार बताता है और पश्चिमी देश तुरंत आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी देकर सत्ता में बैठी सरकार को इस्तीफा देने या देश छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं। कुल मिलाकर, चुनावी धांधली का नैरेटिव किसी भी देश की संप्रभुता को आंतरिक रूप से खोखला करने का एक आजमाया हुआ अंतरराष्ट्रीय फॉर्मूला बन गया है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहाँ लोकतांत्रिक संस्थाएँ अत्यंत मजबूत हैं, वहाँ भी इस टूलकिट के जरिए समाज को विभाजित करने और संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करने की लगातार कोशिशें की जाती रही हैं। यह बात आम हिंदुस्तानी को समय रहते समझ में नहीं आई, तो इसका नुकसान बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अधिक देश और समाज को भुगतना पड़ेगा।