प्रेमानंद विवादः यूट्यूबरों के कृत्यों और कंगारू कोर्ट का कारनामा

संजय सक्सेना

     डिजिटल युग में भारत के भीतर सूचना तंत्र का लोकतांत्रिकरण जिस तेजी से हुआ है, उसने पारंपरिक मीडिया की सीमाओं को तोड़कर अभिव्यक्ति को एक नया खुला आसमान दिया है। इस बदलाव के सबसे बड़े केंद्र बनकर उभरे हैं देश के लाखों स्वतंत्र डिजिटल रचनाकार और यूट्यूबर, जिन्होंने समाज की आवाज बनने और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों को उठाने का बीड़ा उठाया। लेकिन इसी व्यापक और बेलगाम होते जा रहे डिजिटल संसार का एक दूसरा स्याह और डरावना पहलू भी सामने आ रहा है। नाम, शोहरत, व्यूज और मोटी कमाई यानी नाम और दाम की इस अंधी दौड़ में डिजिटल मंचों का एक बड़ा हिस्सा सनसनीखेज कंटेंट परोसने की ऐसी प्रयोगशाला बन चुका है, जो समाज, संवैधानिक मर्यादाओं और देश के शांतिपूर्ण ताने-बाने के लिए गहरी चिंता का विषय बनता जा रहा है। सरोकार की पत्रकारिता या रचनात्मकता का स्थान अब एजेंडा संचालित वीडियो, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों, राजनीतिक विद्वेष और किसी प्रतिष्ठित शख्सियत की छवि को मिट्टी में मिलाने के सुनियोजित प्रयासों ने ले लिया है। सूचनाओं के इस महासागर में विश्वसनीयता और संवेदनशीलता पूरी तरह दरकिनार हो चुकी हैं, और अब स्थिति यह हो गई है कि क्लिक और एल्गोरिदम की रेटिंग के लिए समाज के सौहार्द को दांव पर लगाने से भी गुरेज नहीं किया जा रहा है।

     इस अनियंत्रित दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात एआई की नई तकनीकों ने इस मनमानी को एक ऐसा घातक हथियार दे दिया है, जिसकी वजह से सच और झूठ के बीच का अंतर लगभग खत्म हो चुका है। डीपफेक, वॉयस क्लोनिंग और हेरफेर किए गए विजुअल्स का सहारा लेकर किसी भी सम्मानित नागरिक, राजनेता, अभिनेता या आध्यात्मिक गुरु के चेहरे को झूठी कहानियों में फिट कर दिया जाता है। इस एआई संचालित प्लेटफॉर्म का उपयोग अब वैचारिक नफरत फैलाने, फेक न्यूज को असली खबरों की तरह प्रस्तुत करने और किसी भी संवेदनशील घटना को दंगे की आग में झोंकने के उपकरण के रूप में किया जा रहा है। जब किसी भी घटना की सत्यता को परखे बिना सनसनीखेज थंबनेल और भड़काऊ बयानों के साथ वीडियो अपलोड किए जाते हैं, तो वह समाज में अराजकता फैलाने का जरिया बनते हैं। कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जहां केवल राजनीतिक दलों के खिलाफ नैरेटिव सेट करने या किसी विशिष्ट विचारधारा को लाभ पहुंचाने के लिए आधारहीन और मनगढ़ंत तथ्यों को डिजिटल मीडिया पर दिन-रात चलाया जाता है। यह खेल महज कुछ व्यूज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा व्यापारिक मॉडल काम कर रहा है, जो समाज में दरारें पैदा करके ही मुनाफा कमाता है।

     डिजिटल कंटेंट क्रिएशन की इस आक्रामकता और संवेदनहीनता का एक ज्वलंत और हालिया उदाहरण प्रख्यात आध्यात्मिक संत प्रेमानंद महाराज और जाने-माने यूट्यूबर व पत्रकार शुभांकर मिश्रा के बीच उपजे हालिया विवाद में खुलकर सामने आया है। वृंदावन के एक आश्रम में हुई एक दुखद घटना और प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी (रसिक दुलारी) की रहस्यमयी मौत के बाद, स्वतंत्र डिजिटल मीडिया ने इस मामले को सनसनी की तरह पेश करना शुरू कर दिया। शुभांकर मिश्रा ने अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इस घटनाक्रम की रिपोर्टिंग करते हुए और आश्रम की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे बेहद संवेदनहीनता के साथ आश्रम 2.0 का नाम दे दिया, जिसकी तुलना एक विवादास्पद वेब सीरीज से की जाने लगी। उन्होंने अपने वीडियो के माध्यम से यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की कि क्या पूज्य महाराज जी को किसी व्यवस्था द्वारा हाईजैक कर लिया गया है। इस प्रकार की सतही तुलना और बिना किसी पुख्ता अदालती या पुलिसिया निष्कर्ष के देश के करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र संत प्रेमानंद महाराज को इस विवाद के घेरे में घसीटने के प्रयास ने संत समाज और उनके भक्तों को पूरी तरह झकझोर दिया।

     इस अनुचित तुलना और संत की गरिमा पर उठाए गए सवालों के बाद वृंदावन से लेकर पूरे देश में व्यापक आक्रोश फैल गया, जहां लोगों ने भारी नाराजगी जताते हुए शुभांकर मिश्रा के पुतले तक फूंके। यद्यपि बाद में विवाद के गहराने पर उन्होंने सफाई देते हुए महाराज जी को पूजनीय और सम्मानीय बताया, लेकिन तब तक टीआरपी और व्यूज बटोरने के चक्कर में एक गंभीर और संवेदनशील आध्यात्मिक छवि पर कीचड़ उछालने का काम पूरा हो चुका था। यह पूरी घटना दर्शाती है कि कैसे स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता और यूट्यूबरों का एक बड़ा धड़ा केवल हेडलाइन हंटिंग और सनसनी के लिए तथ्यों की मर्यादा को भूल जाता है। इसी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक महिला की डीपफेक और मॉर्फ्ड (छेड़छाड़ की गई) तस्वीरों का प्रकरण भी डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दुरुपयोग और सोशल मीडिया पर फैलती अराजकता का एक बेहद गंभीर और डरावना उदाहरण था, जिसके खिलाफ कोर्ट में मामला चल रहा है।इस प्रकार की बेलगाम और आक्रामक डिजिटल गतिविधियों की वजह से न केवल समाज शर्मसार होता है, बल्कि कई बार निर्दोष लोगों और सम्मानित परिवारों का पूरा जीवन तबाह हो जाता है। क्योंकि समाज बिना सोचे-समझे उस वायरल झूठ को ही परम सत्य मान लेता है, जिससे पीड़ित व्यक्ति मानसिक अवसाद, सामाजिक बहिष्कार और गहरी ग्लानि के चक्रव्यूह में फंस जाता है। डिजिटल मंचों पर होने वाली इस तरह की पब्लिक लिंचिंग और कंगारू कोर्ट की व्यवस्था के कारण सभ्य समाज की गरिमा तार-तार हो रही है।

     सवाल यह उठता है कि समाज और देश के लिए इतना बड़ा खतरा बन चुके इन विवादित यूट्यूबरों पर समय रहते कड़ी और त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं हो पाती है? इसके पीछे भारतीय डिजिटल कानूनों की जटिलता और मौजूदा नियामक तंत्र की कमियां सबसे बड़ी वजह हैं। भारत में पारंपरिक प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और विभिन्न प्रसारण नियम कानून बने हुए हैं, लेकिन यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे वैश्विक इंटरनेट मध्यस्थों (इंटरमीडियरीज) पर सीधे नियंत्रण की वैधानिक सीमाएं हैं। आईटी अधिनियम (इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट) की धारा 79 के तहत इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को सेफ हार्बर का संरक्षण प्राप्त है, जिससे वे अपने प्लेटफॉर्म पर यूजर द्वारा डाले गए कंटेंट की सीधी जिम्मेदारी से बच जाते हैं। इसके अतिरिक्त, इन यूट्यूबरों के खिलाफ मानहानि या समाज में द्वेष फैलाने के मामले दर्ज होने पर भी कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी और थकाऊ होती है कि त्वरित न्याय की उम्मीद धूमिल हो जाती है। जब तक किसी विवादित या भ्रामक वीडियो को ब्लॉक करने या हटाने की सरकारी या न्यायिक प्रक्रिया पूरी होती है, तब तक वह वीडियो इंटरनेट के कोने-कोने में फैल चुका होता है और जितना संभव होता है उतना नुकसान कर चुका होता है। इसके अलावा, विदेशी धरती से संचालित होने वाले सर्वर और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर मिलने वाले संवैधानिक संरक्षण का बेजा इस्तेमाल भी इन पर नकेल कसने की राह में बड़ा रोड़ा साबित होता है।