बेजोड़ मधु लिमये

श्री मधुजी से मेरी पहली भेंट कब हुई, मुझे ठीक से याद नहीं। शायद डाॅ. लोहिया के घर पर। श्री अर्जुनसिंह भदौरिया, उनकी पत्नी श्रीमती सरला भदौरिया, मधुजी और उनकी पत्नी श्रीमती चंपा लिमये और मैं – हम लोग एक-साथ 7, गुरुद्वारा रकाबगंज रोड पहुंचे थे। लगभग हर शाम डाॅ. लोहिया के घर पर संसोपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के अलावा पत्राकारों और सप्रू हाउस क शोध-छात्रों का जमघट लगा रहता था। उसी तरह के जमघट में पहले-पहल मधुजी से मुलाकात हुई। मधुजी के गौर वर्ण, खादी के कुर्ते-पायजामें, गुरु गंभीर वाणी और मुक्तहास ने मुझे एकाएक प्रभावित किया और पहले ही क्षण में पारस्परिक आश्वस्ति और मैत्राी के भाव का उदय हो गया।

1965 के आसपास की कोई यह पहली मुलाकात पिछले तीस वर्षों के आत्मीय संबंधों की आधारशिला बन गई। इन तीस वर्शों में मेरा किस-किस से परिचय नहीं हुआ और किस-किस से गहरी आत्मीयता नहीं बनी। देश का शायद ही कोई महत्वपूर्ण नेता रहा होगा, जिसे मुझे नजदीक से जानने का अवसर न मिला हो या उससे परिचय न रहा हो। मैं यह बात पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हॅूं कि उन सब में मधु लिमये मुझे बेजोड़ लगे।

लगभग तीस वर्ष पहले प्रथम दर्शन के समय मधुजी जैसे थे, लगभग वैसा ही मैंने अंतिम दर्शन के समय उनको पाया। इन तीस वर्षाें में कई दीनहीन नेताओं और सांसदों को मैने प्रवाह-पतित होते देखा है। कौड़ीपति से करोड़पति बनते देखा है, कुर्सी के लिए रेंगने वाले नेताओं को सिंहासन पर बैठकर इठलाते देखा है। लेकिन मधुजी इन सब में अपवाद थे। वे कभी दीन-हीन नहीं रहे, उलटे सदा शेर की तरह दहाड़ते रहे।

मैं संसद के दिन कभी नहीं भूल सकता, जब मधु लिमये अपना छोटा-सा बस्ता हाथ में लिए लोकसभा सदन में घुसते थे। ज्यों ही मधुजी सदन के दरवाजे से प्रवेश करते, संपूर्ण कक्ष को सांप-सा सूंघ जाता था। लोसभाध्यक्ष सरदार हुकुमसिंह की आंखें मधुजी की सीट पर गड़ जाती थीं और सरकारी बेंचों पर बैठे प्रधानमंत्राी सहित सभी मंत्रिगण के चेहरों पर एक अजीब-सी व्यग्रता उभर आती थी। मधुजी का सदन में आना ऐसा होता था जैसे रोम के महाप्रांगण में बब्बर शेर का प्रवेश करना।

प्रश्नोत्तर काल और शून्यकाल के अनन्य स्वामी मधु लिमये ही हुआ करते थे। संसदीय प्रक्रिया के नियमों की सूक्ष्म जानकारी के लिए विख्यात सर्वश्री हेम बरुओ, नाथपाई, हीरेन मुखर्जी आदि प्रखर सांसदों में मधु लिमये सबसे आगे थे। मधु लिमये ही जानते थे कि आज किस मंत्राी की क्या गति होगी या सदन चलेगा या नहीं। जबर्दस्त प्रश्न पूछने और मंत्राी के उत्तर पर पूरक प्रश्नों की मशीनगन से सरकार को ढेर कर देना मधु लिमये के बांए हाथ का खेल था। कभी-कभी प्रश्नोत्तर काल इतना लंबा खिंच जाता था कि शून्यकाल होता ही नहीं था और शून्यकाल जब भी आता तो सारा सदन सांस रोके एक टक देखता था कि मधु लिमये अपने पिटारे में से पता नहीं कौन-सा नाग निकालेंगे और किस पर छोड़ देंगे। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के संसदीय नेता तो श्री मनीराम बागड़ी थे, लेकिन वास्तव में लगभग आधा दर्जन पार्टी-सांसदों को टीम की तरह चलाने का काम मधुजी ही करते थे। रोज़ सुबह-सुबह डाॅ. लोहिया के घर पर रणनीति बनती। कौन क्या पूछेगा, कौन क्या करेगा, कौन-सी घटना क्या मोड़ ले सकती है, इस पर खुलकर विचार होता। राजनाराणजी राज्यसभा संभालते और मधुजी लोकसभा। डाॅक्टर साहब प्रधान मल्ल की तरह खम ठोकते और सारे समाजवादी भूखे शेर की तरह सत्तापक्ष पर टूट पड़ते। आधा दर्जन सांसद शेष पांच सौ की बोलती बंद कर देते। जिन वर्षों में लोहियाजी और मधुजी सांसद रहे, वे वर्ष संसद के अब तक के इतिहास के मुखरतम वर्ष माने जाएंगे। जनता पार्टी की सरकार के समय सारे देश में यही समझा जाता था कि सरकार चलाने या गिराने वाले दो ही लोग हैं – एक तो राजनारायण और दूसरे मधु लिमये।

मधुजी के बारे में यह झूठ काफी प्रचारित किया गया है कि वे पार्टी तोड़नेवाले विध्वंसकवृत्ति के आदमी थे और जनता पार्टी की सरकार गिराने में भी उनका हाथ था। जहां तक मेरी स्मृति साथ देती है, मधुजी को मैंने सदा फायर ब्रिगेड की तरह काम करते हुए पाया। मोरारजी भाई की सरकार गिराने का आह्वान जिस दिन राजनारायणजी ने किया, मधुजी मुंबई में थे। सुबह दिल्ली पहुंचते ही उन्होंने फोन किया, असलियत मालूम की और मुझसे कहा कि तुम अभी राजनारायणजी के यहां जाओ। राजनारायणजी से काफी दिलचस्प बात हुई (उसका जिक्र कभी और) उनको लेकर मैं मधुजी के घर गया। मधुजी और उनके बीच काफी तर्क-वितर्क हुआ। मधुजी सरकार गिराने के बिलकुल खिलाफ थे। लेकिन हुआ वही, जो राजनाराणजी चाहते थे।

मधुजी कहा करते थे कि दो चीजें आदमी को बहुत बदल देती हैं। एक तो शादी और दूसरा मंत्रिपदं मेरी शादी (1970) के बाद यह बात उन्होंने मुझसे दो-तीन बार कही। जब जनता पार्टी की जीत हुई तो मैंने मधुजी से कहा कि अब आप मंत्री बनेंगे और आप भी दूसरों की तरह बदल जाएंगे। उन्होंने कहा कि तुमको गलतफहमी है। मैं मंत्री बनूंगा ही नहीं। यही बात मुझे शायद 20 मार्च, 1977 को राजनारायणजी ने भी कही और इसे अखबारों में भी छपा दिया। प्रधानमंत्राी मोरारजी भाई ने दोनों को मंत्रिपद का न्यौता दिया। मधुजी डटे रहे। नहीं माने। अपनी जगह हमारे मध्यप्रदेश के श्री पुरुषोत्तम कौशिक को बनवा दिया।

मधुजी मंत्री नहीं बने। कुछ पाया नहीं। लेकिन बराबर देते रहे। किसी भी मंत्री से उनका योगदान कम न था। विदेशी मामलों पर विचार करने के लिए पार्टी की जो कमेटी बनी, उसके मुख्य कर्ताधर्ता मधुजी ही थे। रोज़ फोन पर तो सुबह-सुबह उनसे बात होती ही थी, शाम तक एकाध बार मिलना भी हो जाता था। उन दिनों विदेश नीति पर यों तो सर्वसम्मति ही थी। श्री अटलबिहारी वाजपेयी अत्यंत कुशलतापूर्वक विदेश मंत्रालय चला रहे थे लेकिन तिब्बत, चीन, कोइराला की गिरफ्तारी, ईरानी छात्रों की पिटाई, निरस्त्राीकरण आदि कई ऐसे छोटे-मोटे मसले थे, जिन पर हम लोगों की राय कभी मोरारजी भाई से मेल नहीं खाती थी तो कभी अटलजी से। अब क्या करें? मधुजी कहते थे कि सरकार की नीति हम जितनी बदल सकें, बदलें, वरना कम से कम पार्टी की तरफ से तो साफ बात कहें। वे प्रायः बयान जारी कर देते।

अटलजी से अपनी पुरानी दोस्ती थी। ‘नवभारत टाइम्स’ में मैं भी विदेशनीति पर जो भी ठीक समझता, लिखता। शायद श्री कोइराला की गिरफ्तारी के खिलाफ मैंने एक जरा पैना सम्पादकीय लिखा और उसी दिन बिलकुल वैसा ही मधुजी का बयान भी छपा। विदेश मंत्रालय के मौन की हमने कड़ी निंदा की। अटलजी बड़े प्रेमी आदमी हैं लेकिन उस दिन बिगड़ गए। बोले, ‘मधु लिमये और आप दोनों आ जाइए। आप दोनों चलाइए, विदेश मंत्रालय – मैं छोड़ देता हूं।’ मुझे दुख हुआ। मैंने मधुजी को बताया। मधुजी ने कहा, ‘तुम्हारा दोस्त ठीेक कहता है लेकिन वह यह क्यों नहीं समझता कि सत्ता में आने पर सिद्धांतों को तिलांजलि नहीं दी जा सकती और फिर अटलजी जहां नेपाल के राजा को खुश किए हुए हैं, वहां हमने नेपाल की जनता को खुश कर दिया।’ दोनों नेता अपनी-अपनी बात पर डटे रहे लेकिन उनमें मैंने कभी मनो-मालिन्य नहीं देखा।

ऐसे शीर्षस्थ नेता के बारे में ही मैंने ऊपर कहा कि तीस वर्षाें में उनमें कोई खास बदलाव आया नहीं। मुझे याद है कि जब 16 मई, 1966 को श्री मधु लिमये ने डाॅ. राममनोहर लोहिया के निर्देश पर मेरा मामला संसद में उठाया तो उनके पास एक अदद ट्रांजिस्टर भी नहीं था। मुझे याद है कि लोहियाजी के इस सवाल पर कि ‘इंडियन स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्ट्डीज़’ के अधिकारी ‘वैदिक को पी.एचडी. का शोधपत्र अपनी मातृभाषा में क्यों नहीं लिखने देते’ लोकसभा में अपूर्व हंगामा हुआ, संसद की कार्रवाई ठपप हो गई। मधु लिमये को मार्शल ने सदन से पकड़कर बाहर निकाला। शिक्षामंत्री छागला के जवाब से कोई संतुष्ट न था। सभी दलों के प्रमुख नेताओं ने डाॅ. लोहिया और मधु लिमये की इस मसंग का समर्थन किया कि ‘वैदिक की बंद शोधवृत्ति फिर से शुरू की जाए और उसे मातृभाषा में अपना शोधपत्रा और शोधग्रंथ लिखने की अनुमति दी जाए।’

संसद में उठे इस हंगामी मामले को मैं दर्शक-दीर्घा में बैठा देख रहा था। जब मधुजी और मैं संसद से बाहर आए और घर की तरफ पैदल चलने लगे तो मधुजी ने मुझ से कहा कि हो सके तो तुम एक ट्रांजिस्टर का इंतजाम करो ताकि खबर सुन सकें, पता नहीं रेडियो वाले सारे मामले को कैसे तोड़ें-मरोड़ें। तब यह जानकर मुझे आश्चर्य हुआ कि मधु लिमये जैसे प्रखर सांसद के पास एक ट्रांजिस्टर या रेडियो भी नहीं। उन दिनों पचास-साठ रुपये में अच्छा-सा ट्रांजिस्टर मिल जाया करता था और दो सौ रुपये में बढि़या रेडियो। मैं खुद जब दिल्ली पढ़ने आया तो इंदौर से अपने साथ एक ट्रांजिस्टर लेकर आया था। श्री मधु लिमये की इस सादगी का मेरे मन पर बड़ा प्रभाव हुआ।

श्री लिमये की ऐसी सादगी का सिलसिला उनके जीवन के अंतिम दिन तक बना रहा। दमे के वे पुराने मरीज़ थे। निधन के कुछ माह पहले एक दिन उन्होंने मुझ से कहा कि जिस यंत्र से वे सांस लेते हैं, वह एकदम खराब हो गया है। नया लेना पड़ेगा। यह भी उन्होंने मेरे बहुत पूछने पर बताया। उसकी कीमत लगभग दस हजार रुपये थी। जाहिर है कि मधुजी उसे खरीद नहीं सकते थे। जब मैंने उनसे कहा कि इस यंत्र को लेने के जिम्मेदारी मेरी है तो वे बहुत ही संकोच में पड़ गए और उन्होंने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो मैं तुमको बताउंगा। दो दिन बाद ही उन्होंने मुझे बताया कि पोपट (उनका बेटा अनिरुद्ध) के श्वसुर ने वह यंत्र मंगवा दिया है। जो लोग मधुजी के बहुत बाद राजनीति में आए और जिनकी यशोगाथा और तेजस्विता मधुजी की तुलना में शतांश भी नहीं है, ऐसे लोगों के लिए आज दस हजार रुपये की क्या कीमत है? उनका रोजमर्रा का खर्च दस हजार से भी ज्यादा है।

1964-65 में मधु लिमये जैसे पहले पैदल या रिक्शे से संसद जाया करते थे, वैसे ही अब भी या तो पैदल या सांसदों की बस से या मेरे जैसे मित्रों के वाहन से आया-जाया करते थे। उनके पास अपना कोई वाहन कभी नहीं रहा। जब कोई महत्वपूर्ण संगीत सभा होती तो मधुजी को मैं पहले ही फोन करके अपने आने के खबर दे देता था और यह अनुरोध भी करता था कि कार्यक्रम के बाद वहीं मेरे लिए रुके रहें, कोई स्कूटर या टैक्सी न करें ताकि उन्हें घर छोड़ने का आनंद मैं उठा सकूं। मेरे जैसे कई अन्य साथी यह काम अपना कर्तव्य समझकर हमेशा किया करते थे।

मधुजी के आसपास नौजवान साथियों का एक परिवार-सा बन गया था। मधुजी में कुछ ऐसी खूबियां थीं कि उनके पुराने मित्र तो उनसे जुड़े ही रहते थे, मित्रों के बच्चों का भी मधुजी से लगाव हो जाता था। कलकत्ता वाले विद्यासागरजी के और मेरे दोनों बच्चे तो अक्सर मधुजी के पास ही पहुंचे रहते थे। जब से चंपाजी सेवानिवृत्त हुईं और दिल्ली रहने लगीं तो मधुजी के घर में और अधिक आत्मीयता का वातावरण बन गया। जो भी जाता, उसकी कुछ न कुछ सेवा होती ही थी। पहले मधुजी खुद चाय-काफी बनाकर ले आते थे और बाद में यह काम चंपाजी करने लगीं। मेरे बच्चों को बड़ा आश्चर्य होता था कि मधु लिमये जैसा महान बौद्धिक और प्रखर नेता इतनी सादगी का जीवन कैसे जीता है।

बड़े मामूली नेताओं ने दिल्ली आने के बाद या तो दिल्ली में बड़े-बड़े मकान बना लिए या बरसों-बरसे वे लंबे-चैड़े सरकारी बंगले पर कब्जा किए रहे, लेकिन मधु लिमये थे कि पंडारा पार्क के छोटे से फ्लैट में रहते थे। स्वतंत्राता-सेनानियों को मिलनेवाला यह फ्लैट भी मधुजी ने अपने साथियों के बहुत आग्रह पर स्वीकार किया था। मधुजी का फ्लैट देखकर कोई भी कह सकता था कि ये किसी नेता का नहीं, साधु का घर है या किसी विद्वान की कार्यशाला। इसी छोटे-से फ्लैट की छोटी-सी बैठक में अनेक राज्यपाल, अनेक मुख्यमंत्राी, अनेक केंद्रीय मंत्राी, अनेक विख्यात संपादक, पत्रकार और बुद्धिजीवी मधुजी को घेरे रहते थे। मुझे याद है कि मधुजी जब से दिल्ली आए, उन्होंने कभी किसी बड़े बंगले पर कब्जा नहीं किया। पहले-पहल वे नाॅर्थ एवेन्यू के फ्लेट में रहे, फिर गुरूद्वारा रकावगंज रोड़ के छोटे-से बंगले में, उसके बाद वेस्टर्न कोर्ट के कमरों में और जनता पार्टी के जमाने में पंडारा रोड़ के छोटे-से फ्लेटनुमा बंगले में। उस समय वे चाहते तो प्रधानमंत्री के बाद सबसे बड़ा बंगला मिल सकता था। लेकिन मधु लिमये जैसे लोग संसार में आते हैं, कुछ देने लिए, लेने के लिए नहीं। राजनीति में लेवता तो सभी होते हैं, देवता सिर्फ मधु लिमये जैसे ही लोग होते हैं।

वे संविधान और राजनीति के जीते-जागते ज्ञानकोश थे। किसी भी दल के नेता को अगर किसी तथ्य के बारे में संदेह होता वे मधुजी के पास दौड़ते थे। कहीं संसदीय प्रक्रिया और संविधान का मामला अटक जाता था तो भी मधुजी ही संकटमोचन के तौर पर काम आते थे। लगभग नित्यप्रति वे संसद के पुस्तकालय में जाते थे। उन्हें कई बार मैंने सेंटल हाल से गुजरले हुए देखा, कंधे पर झोला डाले हुए और हाथ में कुछ पुस्तकें व पत्रिका लिए हुए। जब से उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़ी, इतना अधिक लेखन किया कि कोई विश्वविद्यालय का प्रोफेसर भी क्या करेगा। दर्जनों श्रेष्ठ पुस्तकें और सैकड़ों लेख इसके साक्षी हैं।

 

मधुजी की बौद्धिक सूझबूझ लाजवाब थी। स्वयं बा्रह्मण परिवार में पैदा होकर भी उन्होंने आरक्षण के सर्मथन में उस समय प्रखर लेख लिखे जब पिछड़ों के पक्ष में बोलने पर इस देश में जुबानें कट रहीं थीं। उन्होंने मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं का जो प्रचंड समर्थन किया, उसके लिए कौन उनका ऋणी नहीं होगा। अगर सरकारी भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा भंडाफोड़ संसद में किसी ने किया तो वह मधु लिमये ने, लेकिन स्वयं मधुजी किसी भ्रष्टाचरण में नहीं उलझे। विरोधी दलों के नेता सत्तारूड़ दल के नेताओं पर भ्रष्टाचार के भयंकर अरोप लगाते हुए जरा भी नहीं सकुचाते, लेकिन वे स्वयं अपने जीवन में जरा भी सवधानी नहीं बरतते। मधु लिमये, इसके विपरीत अपनी मिसाल, खुद थे।

मुझे 1966 का एक मामला याद आ रहा है। बात बहुत छोटी-सी है, लेकिन उसमें संदेश बहुत बड़ा छिपा हुआ था। किसी उद्योगपति ने मधुजी के नाम एक हजार रुपये का मनीआर्डर भेजा, उस समय उनके नाॅर्थ एवेन्यू वाले घर में मैं अकेला ही था। पोस्टमैन ने मुझे मनीआर्डर दिखाया, मैंने दस्तखत किए और एक हजार रुपए ले लिए। उन दिनों मैं कभी-कभी मधुजी के घर पर सुबह से शाम तक बैठकर लोकसभा के प्रश्नोत्तर तैयार कर दिया करता था। शाम को जैसे ही मधुजी आए, मैंने उन्हें एक हजार रुपए दे दिए। रुपए देखकर वे भौंचक्क रह गए। पूछने लगे कि ये कहां से आए? मैंने उन्हें मनीआर्डर की पर्ची दिखा दी तो बोले कि इस राशि को तुरंत वापस करो। हम क्या किसी उद्योगपति के दलाल हैं? मधुजी ने संसद में चावल के आयात के संबंध में जो सवाल किया था, उससे एक बड़े भ्रष्टाचार का भंडा फूटा था और उसके कारण किसी भारतीय व्यापारी को बड़ा लाभ हुआ था, इसीलिए उसने कृतज्ञतावश यह राशि भिजवाई थी। मधुजी से उसका कोई भी व्यक्तिगत परिचय या संबंध नहीं था। मधुजी ने मुझसे कहा कि संसद में जो भी सवाल मैंने किया, वह राष्ट्रहित में था। अगर उससे किसी अन्य को लाभ हो जाता है तो हमें क्या आपत्ति हो सकती है। लेकिन हम इस तरह से पुरस्कार-राशि स्वीकार करें, यह बहुत ही अपमानजनक है। दूसरे दिन सुबह ही मनीआर्डर द्वारा वह राशि मैंने सधन्यवाद वापस भिजवा दी।

मैंने मधुजी को कभी भी बेजा फायदा उठाते हुए नहीं देखा। एक बार मधुजी को देखने मैं मेडिकल इंस्टीट्यूट गया। उस समय वे सांसद नहीं थे, उनका शायद पांव टूट गया था और वे मेडिकल इंस्टीट्यूट में अकेले पड़े हुए थे, किसी भी साधारण नागरिक की तरह। राज्य-सत्ता जिसके आगे थर-थर कांपती हो, ऐसा दिग्गज नेता किसी भी साधारण नागरिक की तरह सेवकों की फौज के बिना ही अस्पताल में लेटा हुआ हो, यह आज के दिन बिलकुल अकल्पनीय बात है।

मधुजी की पत्नी प्रोफेसर चंपा लिमये मुंबई में मराठी और संस्कृत पढ़ाती रही हैं, लेकिन मैंने उन्हें हमेशा साधारण तृतीय श्रेणी में और जब तृतीय श्रेणी खत्म हुई तो साधारण द्वितीय श्रेणी में यात्रा करते हुए देखा। डाॅ. लोहिया के निधन के बाद मधुजी के घरेलू कामकाज शोमन के जिम्मे रहते थे, लेकिन चंपाजी जब दिल्ली आती तो वे सारे कामकाज खुद ही संभाल लेती थीं। आज दिल्ली में चंपाजी के स्तर की कितनी महिलाएं हैं जो घर का कामकाज खुद करती हों। चंपाजी जैसी जुझारू, पंडिता, कर्मठ और त्यागमयी सहधर्मिणी कितने नेताओं को मिली हैं। वास्तव में, नेताओं को अपनी पत्नियों के कारण भी भ्रष्टाचार का मार्ग मजबूरन पकड़ना पड़ता है। यहां मामला उलटा था। पति और पत्नी, दोनों की सादगी एक-दूसरे को मजबूत बनाती थी। क्या यह आश्चर्य नहीं कि मधुजी की शोक-सभा समाप्त होने के दूसरे दिन ही चंपाजी ने सरकारी क्वार्टर छोड़ने और अपनी छोटी-सी गृहस्थी उठाकर मुंबई जाने की तत्परता दिखाई?

राजनारायण और लिमये, ये दो बड़े नेता इस मायने में भी अनूठे थे कि उन्होंने अपनी संतान को आगे बढ़ाने की कोशिश कभी नहीं की। मधुजी के अनेक मित्रों को उनके बेटे अनिरुद्ध (पोपट) का नाम तक भी पता नहीं। अनिरुद्ध जब बिलकुल बच्चा ही था तो चंपाजी के साथ कभी-कभी दिल्ली आया करता था, इसीलिए मधुजी के पुराने मित्र उसे जानते थे। मधुजी के निधन के तुरंत बाद जब मैं अस्पताल पहुंचा तो मधुजी के इधर के कई मित्रों ने मुझसे पूछा कि ये ‘पोपट’ नाम के सज्जन कौन हैं? इस निस्संग-भाव से अपने राजनैतिक धर्म को निभानेवाले राजनेता आज भारत में कितने हैं?

मधुजी के साथ काम करने का आनंद कुछ अलग ही था। वे संसद में जब भी बोलते थे, अपने विषय की घनघोर तैयारी करते थे। मूल दस्तावेजों को पढ़े बिना वे अपनी राय पक्की नहीं करते थे। जब भी मधुजी का फोन आता, मैं मानकर चलता कि वे कोई न कोई दुर्लभ दस्तावेज़ या अधुनातन संदर्भ-सामग्री मांगेंगे। कई बार सप्रू हाउस के हम शोध-छात्रों को वे अलग-अलग विषयों की संदर्भ सामग्री खोजने के काम में लगा देते थे और जो भी तथ्य उभरते, उन पर खुलकर बहस करते थे। अगर हमारी राय उनके खिलाफ होती तो वे उसे ध्यान से सुनते थे और हमारे तर्काें को उत्साहपूर्वक काटने की कोशिश करते थे। यदि हम लोग अपनी बात पर ज्यादा जोर ेदते थे तो कई बार वे उसे मानने के लिए भी तैयार हो जाते थे। ऊपर से वे बडे़ कठोर मालूम पड़ते थे लेकिन वास्तव में अंदर से बहुत ही कोमल थे, नारियल की तरह।

उन दिनों माहौल ही कुछ ऐसा था कि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के लोग हमेशा आक्रामक मुद्रा अख्तियार किए रहते थे। दूसरे तो दूसरे, अपनों से भी वे भिड़ जाया करते थे। डाॅ. लोहिया ने हजारों छोटे-मोटे मसीहा खड़े कर दिए थे। ऐसे में, कई बार मधु लिमये जैसे दिग्गज को भी कई नौजवान साथियों का सामना करना पड़ता था। कई बार मधुजी इतने जोर से बोलते थे कि हमें लगता था कि वे उत्तेजित हो गए लेकिन ऐसा होता नहीं था। संसद में जोर से बोलने की उनकी आदत-सी बन गई थी। बहस के बाद खुद चाय बनाकर ले आना और साथ में बैठकर खाना खिलाना भी उनकी आदत थी। उनके बर्ताव में जितना खुलापन था, उतनी ही गहरी आत्मीयता भी थी। इसीलिए हम लोगों से दुगुनी उम्र होने के बावजूद मधु लिमये हमें मित्रों की तरह मानते थे और उनसे व्यवहार करने में हम लोगों को जरा भी झिझक नहीं होती थी। उन दिनों मुझे कई बार बड़ा आश्चर्य होता था कि हम बीस-बाईस साल के नौजवान लोग मधुजी को उनका नाम लेकर पुकारते थे और वे इसका जरा भी बुरा नहीं मानते थे। एक मायने में मेरे लिए यह काफी नई संस्कृति थी।

मुझे वह घटना भी इस मौके पर याद आ रही है, जब नवंबर, 1966 में डाॅ. लोहिया ने देशभर के छात्रों को संसद घेरने के लिए दिल्ली बुलाया। श्री यशवंतराव चव्हाण नए-नए गृहमंत्राी बने थे और उन्होंने पुलिस वालों का जबर्दस्त पहरा लगा दिया था। हमारे जितने लोग दिल्ली पहुंचने वाले थे, उनमें से ज्यादातर को दिल्ली के बाहर ही गिरफ्तार कर लिया गया। श्री मधु लिमये और श्री किशन पटनायक सपू्र हाउस छात्रावास आ गए, मेरे कमरे में। वहीं से आंदोलन का संचालन होने लगा। डाॅ. लोहिया ने मधुजी को और मुझे कहा कि हम दिल्ली विश्वविद्यालय जाएं और काॅलेजों के फाटकों पर खड़े होकर सभाएं करें। मधुजी और मैं आटोरिक्शा पकड़कर सबसे पहले हिंदू काॅलेज गए और वहां हमने कई नुक्कड़ सभाएं कीं। उस वक्त मैं मन में सोच रहा था कि देश के ये इतने प्रसिद्ध सांसद मेरे जैसे एक छोटे-से नौजवान को अपने साथ ले जाकर नुक्कड़ सभाएं कर रहे हैं, डाॅ. लोहिया के आदेश का इतनी निष्ठा से पालन कर रहे हैं और उन्हें इस बात का कोई भी भान नहीं है कि मेरी सभा में हजारों आदमी क्यों नहीं हैं तथा मुझे फूल-मालाएं क्यों नहीं पहनाई जा रही हैं। मधुजी की इस निष्ठा का भी मेरे मन पर विलक्षण प्रभाव हुआ और मैंने यह महसूस किया कि मधु लिमये चकाचैंध और सिर्फ सत्ता की राजनीति करनेवाले नेता नहीं हैं, बल्कि परिवर्तनवादी मिशनरी नेता हैं, जिन के रोम-रोम में आदर्शवाद और कर्मण्यता का बसेरा हैं।

समाजवादियों से मेरा परिचय इंदौर के छात्रा-आंदोलनों के समय हो चुका था। स्वयं डाॅ. लोहिया को मैं अपने काॅलेज में, प्राचार्यजी के विरोध के बावजूद, बुला चुका था। इंदौर जेल में हम छात्रों के साथ लाड़लीजी जैसे वरिष्ठ नेता भी पकड़े गए थे लेकिन 1965 में दिल्ली आने पर मुझे समाजवादियों का रंग-ढंग कुछ अजीब-सा लगने लगा। उनकी संघर्षशीलता पर जहां मेरा मन न्यौछावर था, वहीं मुझे लगता था कि इन लोगों के यहां अर्थ-शुचिता और यौन-शुचिता पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता। दूसरे दलों का हाल भी इनसे कोई बेहतर न था। आर्यसमाजी अनुशासन में पले होने के कारण मैं अपनी कसौटी पर सभी नेताओं को कसने की कोशिश करता। एक बार ‘जन’ की मासिक गोष्ठी में डाॅ. लोहिया से भी हल्की-सी भिड़ंत हुई लेकिन श्री मधु लिमये को उक्त कसौटी पर मैंने बिलकुल खरा पाया। मधुजी की नैतिक और आर्थिक स्वच्छता मेरे जैसे नौजवानों के लिए आदर्श बन गई।

मधुजी अन्य नेताओं के मुकाबले लोगों को कठोर क्यों लगते थे? इसका मूल कारण यह था कि उनके पास र्सिु एक जुबान थी। जैसे अंदर, वैसे बाहर। जैसे सभा में, वैसे ही एकांत में भी। मैंने मधुजी जैसा बिना लाग-लपेटवाला दूसरा कोई नेता नहीं देखा। मुझे हमेशा आश्चर्य होता था कि मधुजी चुनाव कैसे जीतते होंगे।

मैंने मधुजी को कभी फिजूलखर्ची करते नहीं देखा। वे कुछ अन्य समाजवादी नेताओं की तरह दरियादिली दिखाने के लिए भी विख्यात नहीं थे। जब किसी से रुपया लेते ही न थे तो बांटते कैसे? उनके साथ घर की खिचड़ी या नाॅर्थ एवेन्यू के केंटीन का दो-ढ़ाई रुपये वाला खाना मैंने कई बार खाया। उनकी कथनी और करनी हमेशा शीशे की तरह पारदर्शी थी।

एक दिन सुबह मधुजी और मैं नाश्ता कर रहे थे। इंडियन स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज़ के निदेशक प्रो. एम.एस. राजन और श्री जयप्रकाश नारायण के मित्रा प्रो. बिमलप्रसादजी (जो बाद में नेपाल में भारत के राजदूत रहे) आ गए। मधुजी से मैंने कहा कि ये दोनों सज्जन मेरे विरुद्ध प्रचार करते घूम रहे हैं। सभी महत्वपूर्ण मंत्रियों और सांसदों के पास जा रहे हैं। दोनों मेरे अध्यापक थे। लोकसभा में बार-बार मेरा मामला इतने जोर-से उठता था कि ‘स्कूल’ के बंद होने के आसार हो गए (बाद में वाकई जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उसका विलय हो गया)। अपने आदरणीय अध्यापकों के सामने बैठने में मुझे झिझक हुई। मैंने पूछा, ‘क्या मैं चुपचाप खिसक जाऊं?’ मधुजी ने कहा, ‘तुम जहां बैठे हो, वहीं बैठे रहो।’ याने पर्दे के पीछे, डाइनिंग टेबल पर ही। पर्दे की दूसरी तरफ कुर्सियां थीं, जिन पर ये तीनों बैठे थे।

वह दिन मुझे हमेशा याद रहेगा। मधुजी ने हमारे डायरेक्टर साहब और प्रोफेसर साहब की जो लू उतारी, वह देखने लायक थी। संसद में मंत्रियों और सांसदों को धोबीपलटा मारते हुए मधुजी को मैंने कई बार देखा था लेकिन हमारी अंतरराष्ट्रीय ख्याति की संस्था के नामी विद्वानों को इस तरह चित करते हुए मैंने उन्हें पहली बार देखा। मुझे लगा कि मधुजी जैसे स्वाध्यायी व्यक्ति का सामथ्र्य डिग्रीधारी पंडितों के मुकाबले कितना अधिक प्रखर है। उनका तर्क, उनका आत्मविश्वास, उनका अभयभाव मुझे ऐसा लगा कि जैसे वह किसी सम्राट का हो।

सिद्धांतों के प्रति मधुजी का समर्पण-भाव इतना अधिक था कि पार्टी के संकीर्ण स्वार्थ उन्हें कभी डिगा नहीं पाते थे। यद्यपि भारतीय भाषाओं को उच्च-शोध का माध्यम बनाने की लड़ाई मूलतः संसोपा ने ही लड़ी लेकिन मधुजी मुझसे हमेशा कहा करते थे कि तुम कांग्रेसियों और जनसंघियों को पटाओ। कम्युनिस्टों और द्रमुकवालों से भी मिलो। इसी का नतीजा था कि संसद में जब-जब मेरे बारे में सवाल पूछे जाते, पं. प्रकाशवीर शास्त्राी, राजनारायणजी, रबिरायजी, जाॅर्ज फर्नांडिस, किशनजी, रामसेवक यादवजी और बागड़ीजी आदि तो मदद करते ही, कांग्रेस के श्री भागवत झा आजाद, श्री विभूति मिश्र, प्रो. सिद्धेश्वरप्रसाद, कम्युनिस्ट पार्टी के प्रो. हीरेन मुखर्जी, भूपेश गुप्त, के. उमानाथ तथा जनसंघ के अटलजी, त्रिवेदीजी आदि भी कोई कसर नहीं छोड़ते। उन्हीं दिनों प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी की भी सहानुभूति मैंने अर्जित की और द्रमुक के नेता श्री अन्नादुरई और के. मनोहरन को भी नरम किया।

मधुजी कहते थे कि भारतीय लोकतंत्र को अगर मजबूत बनाना है तो कुछ मुद्दे ऐसे अवश्य उछालने चाहिए, जिन्हें सभी दलों का समर्थन मिले। डाॅक्टर साहब, मधुजी और राजनारायणजी हमेशा मेरी पीठ ठोकते थे कि तुम्हारी वजह से ‘अंग्रेजी बनाम भारतीय भाषा’ का प्रश्न राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। मधुजी हमेशा कहते थे कि इस मुद्दे पर तुम दूसरों को आगे करो, हम तो तुम्हारे साथ हैं ही।

राष्ट्रहित साधने की यह सात्विक इच्छा मधुजी को उनके अंतिम दिनों में बहुत दूर तक ले गई। नरसिंहराव सरकार बनने के बाद उनसे परामर्श करने मैं उनके घर अक्सर जाया करता था। कभी-कभी वे मुझ पर बरस पड़ते थे। सरकारी नीतियों की वे कड़ी आलोचना करते थे लेकिन कभी-कभी वे बड़े पेचीदा सवालों को हल करने के अत्यंत सुगम तरीके भी बता देते थे। एक तो उनके पास भारतीय राजनीति का गहन अनुभव था और उससे भी बड़ी बात वे उस विलक्षण मेधा-शक्ति के धनी थे, जो उन्हें घटनाओं के आर-पार देखने की सामथ्र्य प्रदान करती थीं। उत्तरप्रदेश में मुलायम सरकार का उन्होंने डटकर समर्थन किया और यह माना कि डाॅ. लोहिया के सपनों को अगर कोई साकार कर रहा है तो वह मुलायमसिंह ही कर रहे हैं।

इसी प्रकार उन्होंने न केवल नरसिंहराव सरकार की कमोबेश सराहना की बल्कि कांग्रेस को जिंदा रखने की वकालत भी की। उनकी मुख्य चिंता यह थी कि भारत कहीं सोवियत संघ की तरह बिखर न जाए। भारत को जोड़े रखने के लिए कए अखिल भारतीय पार्टी नितांत आवश्यक है। कांग्रेस का कोई ठोस विकल्प उभर नहीं रहा है। इसीलिए वह जैसी भी है, उसे जिंदा रखना जरूरी है। जिंदगी-भर कांग्रेस का विरोध करनेवाले मधुजी के ये विचार चैंकानेवाले थे लेकिन अब अपने अंतिम वर्षों में पार्टी नेता की बजाय मधुजी किसी राजर्षि की तरह सोचने लगे थे।