बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस को जरुरत है नरेन्द्र मोदी की !

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पहली बार चुनावी राजनीति के मंथन के लिये तैयार हो रहा है। 12 जुलाई से नागपुर से सटे अमरावती में करीब 250 प्रचारक तीन दिनों तक संघ की चल रही योजनाओं पर चर्चा के साथ साथ मिशन 2014 का पाठ भी पढेंगे। यानी हर बरस जो प्रचारक अलग अलग प्रांतों में चल रहे संघ के कार्यक्रमों की रुपरेखा बताते रहे है पहली बार उसमें राजनीतिक चुनाव का भी मिशन होगा। और प्रचारकों के इस मंथन से निकलेगा क्या यह तो किसी को नहीं पता लेकिन हर प्रचारक कैसे अपने अपने क्षेत्र में हिन्दू समाज के सामने राजनीतिक चुनाव की अलख नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी के लिये जगाये, इस पर मंथन जरुर करेगा। यानी पहली बार संघ प्रचारक की कार्यशौली राजनीति होगी। पहली बार संघ राजनीतिक चुनाव में सीधी दखल देगा। पहली बार संघ बीजेपी को राजनीतिक चुनाव का ककहरा पढ़ायेगा। और यह शुरु होगा कैसे इसकी एक झलक लालकृष्ण आडवाणी ने नागपुर में संघ के मुखिया से मुलाकात के बाद चार दिन पहले ही यह कहकर दे दी थी कि आने वाले चुनाव में संघ की अगुवाई में बीजेपी खुद को तैयार करेगी। ध्यान दें तो

पहले मुरली मनोहर जोशी फिर लाल कृष्ण आडवाणी उसके बाद राजनाथ सिंह। बीते हफ्ते लगातार तीन दिन बीजेपी के तीनो कद्दावर नेता एक एक कर नागपुर पहुंचे। सरसंघचालक मोहन भागवत और सहसरसंघचालक भैयाजी जोशी से मुलाकात की। हर मुलाकात के बाद हर किसी को समझ में आ गया कि आरएसएस की ड्योढी पहली बार राजनीति का ककहरा बताने के लिये खोली गई है। और इसका खुला एलान रविवार को नागपुर में डां मुंजे की किताब के विमोचन के मौके पर भैयाजी जोशी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर माना कि लोकतंत्र में राजनीतिक चुनाव के लिये हिन्दु मत को तैयार करना भी जरुरी है और अब संघ इसके लिये पहल करेगा। तो क्या यह माना जाये कि दिल्ली की चौकड़ी को सीधा संदेश संघ दे रहा है कि मिशन 2014 का रास्ता बनाया कैसे जाये। क्योंकि अभी तक तीन मंत्र निकले हैं। पहला मोदी के रास्ते रुकावट कोई ना डाले । दूसरा मोदी समूची पार्टी को लेकर चले। और तीसरा राजनाथ सिंह ज्यादा राम राम या मोदी मोदी ना कहे ।

 

लेकिन संघ जो रास्ता बीजेपी को दिखा रहा है, उसमें पहली बार बीजेपी की असफलता का ब्यौरा भी है। मसलन संगठन जनसंघ के बाद से नहीं बना। हिन्दु वोटरों को राजनीतिक तौर पर बीजेपी ने जागरुक करने का कोई प्रयास नहीं किया। और पुरानी पीढ़ी ने कभी नयी पीढ़ी के लिये सियासी रास्ता नहीं छोड़ा। इसलिये राजनीतिक तौर पर कभी संघ से परहेज करने वाले आडवाणी भी मान रहे हैं कि संघ ना होता तो कुछ ना होता। लेकिन असल सवाल तो नरेन्द्र मोदी को लेकर है। क्योंकि 2001, 2002, 2007, 2012 चार बार मोदी सीएम पद की शपथ ले चुके हैं। लेकिन गुजरात से बाहर कभी किसी पद की शपथ नरेन्द्र मोदी ने ली नहीं। और पहली बार नरेन्द्र मोदी जिस राजनीतिक उड़ान की तैयारी में जुटे हैं, उसका मकसद सिर्फ और सिर्फ दिल्ली में शपथ लेना है। और शपथ की तारीख चाहे 21 मई 2014 हो लेकिन मोदी की तेजी दिखा रही है कि पहली बार मई 2014 , 2013 में ही आ जायेगा।

 

यह पहली बार है कि नरेन्द्र मोदी को चुनाव से बरस भर पहले ही चुनाव प्रचार समिति की बागडोर सौप दी गई। जबकि इससे बीजेपी में चुनाव प्रचार की बागडोर सौंपने की परंपरा चुनाव से चार महीने पहले की रही है। तो पहला सवाल इस बार ऐसा क्या है जो मोदी से लेकर बीजेपी अध्यक्ष और संघ ने भी जल्दबाजी दिखायी। पहली बार चुनाव प्रचार समिति के सदस्यो के चयन को लेकर संसदीय बोर्ड एक के बाद एक बैठक कर रहा है और खुद बीजेपी अध्यक्ष इसी में अपनी रुचि दिखा रहे हैं। तो दूसरा सवाल है कि इससे कभी संसदीय बोर्ड इस झमले में नहीं पड़ा और चुनाव से पहले किसी भी बीजेपी अध्यक्ष ने वैसी मशक्कत नहीं की जो इस बार राजनाथ सिंह करते दिख रहे हैं। राजनाथ सिंह ने यह जल्दबाजी तो 2009 में भी बतौर अध्यक्ष नहीं दिखायी थी। फिर पहली बार चुनाव प्रचार समिति का मुखिया यानी मोदी बीजेपी पर भी भारी है और अधयक्ष पर भी। और लग यही रहा है कि पूरी पार्टी ही मोदी की पहलकदमी पर जा टिकी है। तो तीसरा सवाल है कि इससे पहले कभी प्रचार के मुखिया का कद ना तो पार्टी से बड़ा माना गया ना ही बनाया गया। लेकिन इसबार ऐसा क्या है कि बीजेपी से लेकर एनडीए का भाग्य तक मोदी से जोडा गया है ।

 

तो नरेन्द्र मोदी क्या करें। मई 2014 , 2013 में तो आ नहीं सकता लेकिन 2013 , 2014 के इंतजार में मोदी का नाम जपते हुये कट जाये इसका प्रयास तो मोदी कर ही सकते है। तो ध्यान दीजिये बीजेपी में 2013 की सारी हड़बड़ाहट मोदी को 2014 के केन्द्र में लाने -बैठाने की है। क्योंकि बीजेपी का अपना सच यही है कि संघ के संगठन और मोदी के कारपोरेट के अलावे उसके पास वही फूंके हुये कारतूस है जिसे परिवार ने ही एक वक्त खारिज कर दिया था। लेकिन यही से मोदी को लेकर काग्रेस के सवाल खडे होते है ।

 

क्योंकि कांग्रेस की राजनीति जिस तर्ज पर मोदी को उछाल रही है, उसी तर्ज पर राहुल गांधी को छुपा भी रही है। और ध्यान दें तो बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस के मिशन 2014 के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी हैं। न्यूज चैनलों पर कांग्रेस की प्रचार कमान संभाले दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी , रेणुका चौधरी और शकील अहमद की चौकड़ी के बयानों को परखें तो कभी किसी ने राहुल गांधी के हाथ 2014 की कमान सौंपने की बात उस तरह नहीं की, जितनी बात नरेन्द्र मोदी के हाथ बीजेपी की कमान सौपने का सवाल उठाया। यानी मोदी जब जब रुके या थमे से नजर आये तब तब काग्रेस ने ही मोदी का नाम उछाल कर उन्हे रफ्तार देकर बीजेपी के भीतर हिचकोले पैदा करने का प्रयास किया । बोध गया में घमाके पर दिग्विजय के मोदी बयान से बीजेपी भी मोदी पर सफाई देते हुये काग्रेस पर निसाना साधने में उलझी । फुड सिक्योरटी बिल के जवाब में काग्रेस ने मोदी के कारपोरेट प्रेम पर कसीदे गढे । तो बीजेपी भी मोदी के विकास पर सफाई देने में उलझी । नीतिश कुमार के अलग होने पर मोदी के साप्रदायिक चेहरे को उभारने में काग्रेस जुटी तो बीजेपी ने मोदी के गुजरात पर सफाई देने में उलझी । ध्यान दें तो काग्रेस ने पहली बार अपनी असफलताओं को छुपाने के लिये उसी मोदी को ढाल बनाया है जिस मोदी को उभारने से बीजेपी के कद्दवर नेता आज भी कतराते हैं। यानी कांग्रेस की लोकसभा चुनाव को लेकर रणनीति साफ है । मोदी के नाम की जयजयकार हर वक्त होती रहनी चाहिये। बीजेपी का कद मोदी से छोटा हो जाये। मोदी आरएसएस के चुनावी नुमाइन्दे लगे। क्योंकि यही एक रास्ता कांग्रेस को 2014 की दौड़ में बरकरार रख सकता है। और राजनीतिक चुनाव का सच देखिये काग्रेस 2014 के लिये मोदी को खोना नहीं चाहती है।