युवाओं की साइलेंट अटैक से मौत, क्या खराब लाइफस्टाइल है असली वजह

    आजकल छोटे-छोटे बच्चे और युवा तक आश्चर्यजनक रूप से चुपचाप हृदयाघात के शिकार होकर जान गंवा रहे हैं, जिससे समाज में भय का माहौल बन गया है। विपक्षी दलों के नेता इन मौतों को कोरोना काल में लगे टीके से जोड़ रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार ने पर्याप्त जांच-पड़ताल के बिना टीकाकरण अभियान चलाया था। लेकिन विशेषज्ञों का मत इससे बिल्कुल उलट है; वे खराब जीवनशैली, प्रदूषण और आनुवंशिक कारणों को मुख्य दोषी मानते हैं, जबकि टीके का कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया। भारत में युवाओं में चुपचाप हृदयाघात के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में तीस साल से कम उम्र वालों में ऐसी मौतें चालीस प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की संयुक्त जांच में पाया गया कि अठारह से पैंतालीस साल के युवाओं की अचानक मौतों में 42 प्रतिशत मामलों में हृदय रोग ही कारण था, जिसमें बायीं अगली उतराने वाली धमनी में 70 प्रतिशत से अधिक रुकावट मिली। अधिकांश पीड़ित घटना से ठीक पहले पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देते थे, क्योंकि यह रोग चुपचाप बढ़ता रहता है और कोई स्पष्ट चेतावनी नहीं देता।दक्षिण एशियाई लोगों में पचास साल से पहले हृदयाघात का खतरा पश्चिमी लोगों की तुलना में तीन-चार गुना अधिक होता है, जो आनुवंशिक संरचना से जुड़ा है।

     टीके के आरोपों पर विशेषज्ञों की राय एकमत है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली ने तीन सौ से अधिक मामलों की जांच की, जिसमें शव-परीक्षण से साबित हुआ कि कोरोना टीके और अचानक हृदय गति रुकने का कोई संबंध नहीं है। डॉक्टर करण मदन ने स्पष्ट कहा कि टीके ने वास्तव में मौतों को कम किया, जबकि युवाओं में हृदय समस्याएं जीवनशैली और अन्य कारकों से उपजी हैं। पूर्व अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने भी सोशल मीडिया की अफवाहों को भ्रामक करार दिया। पीएसआरआई हृदय संस्थान के अध्यक्ष डॉक्टर केके तलवार ने जोर दिया कि इनमें टीके का कोई प्रमाण नहीं मिला, बल्कि अनजानी धमनी रुकावट ही प्रमुख वजह है। कुछ विदेशी अध्ययनों में टीके के दुष्प्रभाव का जिक्र है, लेकिन भारत के संदर्भ में ये दावे खारिज हो चुके हैं।इन मौतों के पीछे कई कारण कार्यरत हैं। सबसे बड़ा कारण खराब जीवनशैली है, जिसमें बाहर का तला-भुना खाना, अधिक नमक युक्त भोजन, मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप शामिल हैं। प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नरेश त्रेहान कहते हैं कि तनाव, तेज चलने वाली जिंदगी और प्रदूषण हृदय को चुपचाप नुकसान पहुंचा रहे हैं। दूसरा प्रमुख कारण वायु प्रदूषण है, खासकर दिल्ली जैसे शहरों में, जहां सूक्ष्म कण रक्तप्रवाह में घुसकर धमनियों में जमाव बनाते हैं, जिससे हर दस इकाई वृद्धि पर हृदयाघात का खतरा ढाई प्रतिशत बढ़ जाता है। तीसरा, आनुवंशिकता, जो दक्षिण एशियाई नस्ल में कम उम्र से धमनी रोग को बढ़ावा देती है। इसके अलावा धूम्रपान, शराब, नशीले पदार्थ, कम नींद, व्यायाम की कमी और देर से पता चलना भी जिम्मेदार हैं। युवा जिम जाते हैं, लेकिन अतिरिक्त व्यायाम या नकली दवाओं से खतरा और बढ़ जाता है।

     चुपचाप हृदयाघात के लक्षण भी नजरअंदाज हो जाते हैं। सीने में तेज दर्द न होने पर थकान, सांस लेने में तकलीफ, पेट खराबी, जबड़े या पीठ में दर्द तथा ठंडा पसीना सामान्य समझ लिया जाता है। विशेषज्ञ चेताते हैं कि युवा स्वास्थ्य जांच टालते हैं, इसलिए उच्च वसा या रक्तचाप की समस्या देर से सामने आती है।इनसे बचाव के उपाय सरल लेकिन प्रभावी हैं। सबसे पहले नियमित जांच करवाएं; तीस साल से ऊपर वालों को रक्तचाप, मधुमेह तथा वसा की जांच अनिवार्य हो, विशेषकर यदि परिवार में हृदय रोग का इतिहास हो। दूसरा, स्वस्थ भोजन अपनाएं जिसमें फल और सब्जियां अधिक हों तथा तेल, मसाले और नमक कम। तीसरा, प्रतिदिन तीस से पैंतालीस मिनट पैदल चलें, योग या प्राणायाम करें। चौथा, बुरी आदतें त्यागें जैसे धूम्रपान, तंबाकू तथा शराब। पांचवां, तनाव नियंत्रित रखें, ध्यान या अच्छी नींद से। प्रदूषण से बचाव के लिए मास्क लगाएं, उच्च प्रदूषण सूचकांक पर घर में रहें तथा शुद्धिकरण यंत्र का उपयोग करें। डॉक्टर संदीप बंसल के अनुसार, सूक्ष्म कण वसा को प्रभावित कर जमाव बनाते हैं, इसलिए सावधानी बरतें। आवश्यकता पर चिकित्सक द्वारा दी गई दवाएं जैसे रक्तचाप नियंत्रक लें।

    हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर उपेंद्र कौल कोरोना बाद हृदय जांच की सलाह देते हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के अध्ययन से पता चलता है कि समय पर पता चलने से 80 प्रतिशत मामले रोके जा सकते हैं। सरकार को जागरूकता अभियान चलाना चाहिए, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर जीवनशैली में बदलाव अनिवार्य है। युवा पीढ़ी को सतर्क होना होगा, वरना यह समस्या महामारी का रूप ले सकती है। डॉक्टर सुधीर गुप्ता जैसे फोरेंसिक विशेषज्ञ परिवारजन की जांच पर जोर देते हैं, क्योंकि चुपचाप रोग धीरे-धीरे फैलता है। निष्कर्षतः, टीके की अफवाहें निराधार हैं, असली शत्रु हमारी लापरवाही है। समय रहते सुधार करें तो हृदय सुरक्षित रहेगा।

 

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