राहुल-प्रियंका का ग्लैमर, मीडिया की बेवकूफी या साजिश

     कांग्रेस का गांधी परिवार भारतीय राजनीति का एक ऐसा रहस्य बना हुआ है जो दशकों से अनसुलझा है। आश्चर्य होता है कि गांधी परिवार की नाकामियां साफ नजर आने के बावजूद कांग्रेसी नेता उनके आगे नतमस्तक क्यों बने रहते हैं? नेहरू युग से शुरू हुआ यह सिलसिला राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा तक पहुंचा है, जहां परिवार के दोनों वारिसों का योगदान कांग्रेस के पतन में कहीं ज्यादा साफ दिखता है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का बुरा हाल रहा सीटें घटकर महज 44 और फिर 52 रह गईं। फिर भी कांग्रेसी नेता चुपचाप उनके पीछे लाइन लगाए खड़े हैं। यह वफादारी समझ में आ सकती है, क्योंकि उनके पास परिवार से जुड़े हित, पुरानी दोस्तियां और राजनीतिक उत्तराधिकार की मजबूरियां हैं। लेकिन मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स का यह आकर्षण क्या है? राहुल-प्रियंका की हर छोटी-मोटी गतिविधि, हर बयान को ब्रेकिंग न्यूज़ बना देना? यह ग्लैमर कहां से आता है, जब तथ्य इनकी राजनीतिक साख को धूल चटाते हैं?कांग्रेसियों की स्थिति तो कुछ हद तक सहानुभूतिपूर्ण लग सकती है। नेहरू-इंदिरा राज की चमक अभी भी उनके दिमाग में बसी है। गांधी परिवार को पार्टी का सूत्रधार मानना उनकी रणनीति का हिस्सा है। राहुल के अध्यक्ष बनने पर भी पार्टी ने हार स्वीकार की, लेकिन विद्रोह नहीं किया। प्रियंका की उत्तर प्रदेश में एंट्री को मास्टर स्ट्रोक समझा गया, पर 2022 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। कांग्रेसी जानते हैं कि गांधी परिवार के बिना पार्टी का कोई भविष्य नहीं है। कांग्रेसियों की मजबूरी है उनको गांधी परिवार से इतर वैकल्पिक चेहरा न होने से डर लगता है। लेकिन मीडिया की यह भक्ति कहां से उपजी? क्या यह नेहरूवादी विरासत का भूत है या कुछ और?

      राहुल गांधी पर पप्पू का तमगा चिपक चुका है। संसद में नारे लगाना, विदेश यात्राओं पर बयानबाजी, और चुनावी हार के बाद भगोड़ा बन जाना ये सब तथ्य हैं। 2024 लोकसभा में इंडी गठबंधन में उनकी भूमिका रही, लेकिन कांग्रेस फिर 99 सीटों पर सिमट गई। प्रियंका वाड्रा की कहानी भी कमाल की है। पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रभारी बनीं, लेकिन योगी आदित्यनाथ के सामने धराशायी। वायनाड उपचुनाव में राहुल की हार, प्रियंका की सड़क यात्राएं ये मीडिया में सब सुर्खियां बटोरती रहीं। मीडिया इन्हें मोदी-योगी जैसे दिग्गजों से तौलता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात से केंद्र तक का सफर तय किया, योगी ने उत्तर प्रदेश को अपराध मुक्त और विकास के पथ पर ला खड़ा किया। ममता बनर्जी ने बंगाल में टीएमसी को मजबूत बनाया, मायावती ने दलित राजनीति को नई ऊंचाई दी, अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी को युवा चेहरा दिया। इनकी साख तथ्यों पर टिकी है विकास, सुशासन, जीत। परंतु राहुल-प्रियंका की साख? सिर्फ वंशवाद और हार की कहानियां।फिर भी टीवी चैनल्स पर राहुल का हर ट्वीट ब्रेकिंग न्यूज़। प्रियंका का कोई सड़क शो तो जैसे चुनाव जीत लिया। क्यों? तथ्य बताते हैं कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा वामपंथी विचारधारा से प्रभावित है। नेहरू युग में प्रेस को संरक्षण मिला, आज भी वही पुराना कनेक्शन काम करता है। टीआरपी की होड़ में विवादास्पद बयान बिकते हैं। राहुल का "चौकीदार चोर है" या प्रियंका का मोदी पर हमला ये चटपटे हैं। मोदी का कोई भाषण? बोरिंग विकास गाथा। योगी का बुलडोजर एक्शन? तो सांप्रदायिक करार दो। लेकिन गांधी परिवार को ग्लैमर का चोला पहनाना क्यों? शायद इसलिए कि वे विपक्ष के प्रतीक हैं। विपक्ष कमजोर हो तो सरकार की जवाबदेही कम। मीडिया जानबूझकर गांधी भाइयों-बहनों को फुल कवरेज देता है ताकि विपक्ष का भ्रम बना रहे।

      तथ्यों पर गौर करें। 2019 चुनाव में राहुल की अमेठी हार ने परिवार की राजनीतिक पूंजी को चकनाचूर कर दिया। प्रियंका को सोनिया ने मैदान में उतारा, लेकिन परिणाम? जीरो। 2023 मध्य प्रदेश में कांग्रेस हारी, राहुल की भारत जोड़ो यात्रा बेकार। इसके उलट मोदी ने 2014 से तीन चुनाव जीते, योगी ने 2022 में 273 सीटें दिलाईं। अखिलेश ने 37 लोकसभा सीटें झटकीं। ये नेता काम से पहचाने जाते हैं, न कि वंश से। मीडिया की तुलना गलत क्यों? क्योंकि राहुल को युवा चेहरा कहना मजाक है। उम्र में अखिलेश से बड़े, पर उपलब्धि शून्य। प्रियंका को महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बताया जाता है? जबकि पार्टी में महिलाओं की भागीदारी घट रही है।गांधी खानदान के प्रति यह ग्लैमर का भ्रम क्यों टूटता नहीं? सोशल मीडिया पर गांधी परिवार को ट्रोल किया जाता है, लेकिन मुख्यधारा मीडिया चुप। क्योंकि चैनल्स के मालिकों के हित जुड़े हैं। पुरानी कांग्रेसी सरकारों से लाभ मिला। आज भी विपक्षी ध्रुवीकरण से फायदा। राहुल का अमेरिका दौरा जहां वे "डेमोक्रेसी खतरे में" बोलते हैं, वहां मोदी की जी-20 सफलता दब जाती है। प्रियंका का हर बयान महत्वपूर्ण बन जाता है। तथ्य कहते हैं इनकी लोकप्रियता घटी है। सर्वे दिखाते हैं मोदी-योगी टॉप पर। फिर भी मीडिया गांधी परिवार को हीरो बनाता है। क्यों? शायद डर से। सरकार का पक्ष लेने पर लाइसेंस रद्द का भय। विपक्ष को जिंदा रखना सुरक्षित लगता है।खैर, कांग्रेसियों की मजबूरी समझ आती है, वे पार्टी बचाने के लिए झुकते हैं। लेकिन मीडिया का यह आग्रह तथ्यों का अपमान है। जब तक यह जारी रहेगा, राजनीति का संतुलन बना रहेगा, पर लोकतंत्र कमजोर होगा। राहुल-प्रियंका को सच्चाई का आईना दिखाना होगा। उनकी तुलना उन नेताओं से न करें जिन्होंने मेहनत से इतिहास रचा। वरना यह ग्लैमर का बुलबुला फूटेगा ही। समय आ गया है कि मीडिया तथ्यों पर खड़ा हो, वंशवाद के आगे न झुके। 

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

*