साम्प्रदायिकता की बुझे आग,हर हर दीपक बने घर घर जले चिराग़

     भारत को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने के बड़े पैमाने पर चल रहे दुष्प्रयासों के बीच मानवतावादी हिंदुत्व के एक प्रबल प्रतीक के रूप में पिछले दिनों उत्तराखंड के कोटद्वार के एक जिम ट्रेनर दीपक कुमार का नाम एक 'प्रकाश पुंज ' के रूप में सामने आया।  दीपक ने एक मुस्लिम बुज़ुर्ग दुकानदार को साम्प्रदायिक बवाल से बचाने के लिए स्वयं को "मोहम्मद दीपक" बताते हुये उपद्रवियों का मुक़ाबला किया और उन्हें खदेड़ भगाया। दरअसल कोटद्वार में "बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर" नाम की क़रीब 30 वर्ष पुरानी गार्मेन्ट की दुकान 75 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद चलाते हैं। गत  26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) को बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ताओं ने दुकान के नाम में 'बाबा' शब्द होने पर आपत्ति जताई और "बाबा" शब्द को स्थानीय हनुमान मंदिर से जोड़ते हुए दूकान का नाम फ़ौरन बदलने की धमकी दी। जबकि दुकानदार का कहना था कि "बाबा" शब्द सभी धर्मों में इस्तेमाल होता है। इसी विवाद के बढ़ने पर दीपक कुमार कश्यप जो पास ही एक जिम चलाते हैं अपने एक सहयोगी विजय रावत के साथ मौक़े पर आ पहुंचे । दीपक कुमार बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप में मुंबई में भाग लेने तथा ओलंपियाड में टॉप-6 में  रहने वाले स्थानीय युवक हैं । दीपक कुमार के वहां पहुँचने व मामले में हस्तक्षेप करने पर जब प्रदर्शनकारियों ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम  "मोहम्मद दीपक" बताया। दीपक ने कहा, "मैं न हिंदू हूं, न मुस्लिम; सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है।" उन्होंने उस समय उपद्रवियों का डटकर मुक़ाबला कर उन्हें मौक़े से खदेड़ भगाया। उसके बाद इस विवाद ने और अधिक तूल तब पकड़ा जब इस घटना के बाद बजरंग दल व इससे जुड़े हिंदूवादी संगठनों के लोगों ने दीपक के जिम के बाहर प्रदर्शन शुरू किया। बात इतनी बढ़ी कि पुलिस ने दोनों पक्षों पर मुक़दमे दर्ज कर दिये। दीपक व उनके साथी विजय रावत के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 115(2), 191(1), 351(2) और 352 लगाई गईं। परन्तु दीपक का आरोप है कि सत्ता के दबाव में पुलिस ने एकतरफ़ा रवैया अपनाया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ भी प्राथमिकी दर्ज की है।

     बहरहाल इस घटना के बाद पूरे देश का उदारवादी समाज "मोहम्मद दीपक" व उनके साथी विजय रावत को देश में दिनोंदिन बढ़ती जा रही साम्प्रदायिकता के इस दौर में उम्मीद की एक 'मशाल' के रूप में देख रहे हैं। पूरे देश में उनकी सराहना हो रही है। उन्हें इंसानियत और संविधान के लिए खड़े होने के प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है। संसद से सड़कों तक उनकी हिम्मत और हौसले की चर्चा करते हुये उनकी प्रशंसा की गयी। जगह जगह से सरकारी व ग़ैर सरकारी स्तर पर उन्हें सम्मानित किये जाने की चर्चा चल रही है। कोटद्वार पहुंचकर उनसे मिलने वालों का तांता लगा हुआ है। देश का उदारवादी वर्ग उन्हें वास्तविक हिंदुत्व के एक रौशन चेहरे के रूप में देख रहा है। रातों रात उनके फ़ॉलोवर्स की संख्या में लाखों का इज़ाफ़ा हो रहा है। राहुल गांधी ने तो दीपक की बहादुरी की तारीफ़ करते हुए उन्हें "भारत का हीरो" तक कह दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि दीपक संविधान और इंसानियत के लिए लड़ रहे हैं, और नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान का जीवित प्रतीक हैं। राहुल ने यह भी पोस्ट किया कि – "डरो मत, तुम बब्बर शेर हो। हम तुम्हारे साथ हैं भाई।" बेशक यह हौसला बढ़ाने और नफ़रत के ख़िलाफ़ एकता का संदेश था। राहुल ने दीपक को बब्बर शेर इसलिए कहा क्योंकि उन्होंने मुस्लिम दुकानदार को बचाने के लिए साहस दिखाया। जब कि ऐसे हालात में प्रायः लोग तमाशबीन बनकर देखते रहते हैं और उपद्रवी अपनी करतूतों से शांतिपूर्ण वातावरण में साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलकर चले जाते हैं। परन्तु दीपक व उसके साथियों के साहस ने यहाँ ऐसा नहीं होने दिया।           

     इसी तरह याद कीजिए  22 अप्रैल 2025 का वह दिन जब जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन घाटी में पर्यटकों का धर्म पूछकर 26 लोग आतंकी हमले में मारे गए थे उस समय भी एक स्थानीय घुड़सवार आदिल हुसैन शाह अपनी जान की परवाह किये बिना मेहमान हिन्दू पर्यटकों को बचाने के लिये आतंकवादियों से भिड़ गये थे। इस संघर्ष में आदिल को कई गोलियां लगीं, और वे वहीं शहीद हो गए। आदिल की हिम्मत ने कई पर्यटकों की जान बचाई अन्यथा मरने वालों की संख्या और बढ़ जाती। घटना के अनुसार आदिल पर्यटकों के साथ घोड़े पर थे जब उन्होंने देखा कि आतंकी निर्दोषों पर गोलीबारी कर रहे हैं तो उन्होंने चीख़ चीख़ कर आतंकियों से कहा कि 'यह पर्यटक कश्मीर के मेहमान हैं और निर्दोष हैं, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो'। परन्तु जब आतंकी नहीं रुके, तो आदिल ने एक आतंकी से हाथापाई की और उसकी राइफ़ल छीनने की कोशिश की। तभी आतंकियों ने आदिल को गोलियों से छन्नी कर दिया। इसी आतंकी हमले में नज़ाकत अहमद शाह और सज्जाद अहमद भट जैसे मुस्लिम शॉल विक्रेता व गाइड ने पर्यटकों की जान बचाई, जो कश्मीरियों की मानवता के प्रतीक बने। पहलगाम के निवासी  नज़ाकत अहमद शाह सर्दियों में छत्तीसगढ़ के चिरमिरी में शॉल व गर्म कपड़े आदि बेचने जाते थे, जहां उनके संबंध अरविंद अग्रवाल परिवार से हो गये। पहलगाम आने पर  नज़ाकत ने ही अग्रवाल परिवार के 11 पर्यटकों को गाइड किया। बैसरन घाटी में हमले के दौरान आतंकियों की गोलीबारी शुरू होते ही वे अग्रवाल परिवार के बच्चों को उठाकर बाड़ तोड़कर सुरक्षित जगह ले गए और बाक़ी सदस्यों को भी पहलगाम पहुंचाया। हालांकि उसी क्षण आतंकियों की गोली से मारा गया आदिल हुसैन, नज़ाकत अहमद शाह का  रिश्तेदार था फिर भी उन्होंने पर्यटकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को प्राथमिकता दी। उस समय नज़ाकत शाह ने कहा था कि – "मेहमानों को बचाना मेरी पहली ज़िम्मेदारी थी , चाहे ख़ुद बचें या न बचें'। एक अन्य "शॉल विक्रेता सज्जाद अहमद भट ने भी घायल पर्यटकों को अपने कंधे पर उठाकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया।  भट ने भी उस समय यही कहा था कि , "धर्म से पहले इंसानियत है।

मुहम्मद दीपक से लेकर आदिल, नज़ाकत व सज्जाद तक में एक बात तो सामान्य है कि इन सभी की बहादुरी के क़िस्से सार्वजनिक होते ही देश-दुनिया के करोड़ों लोगों का प्यार इनके प्रति उमड़ पड़ा। गोया आम लोग इन्हें शांति व सद्भाव का मसीहा समझने लगे। बस प्रत्येक आतताइयों,अतिवादियों व नफ़रती लोगों के नापाक मंसूबों को पलीता लगाने के लिये हर घर से दीपक,आदिल,नज़ाकत व सज्जाद जैसे मानवतावादियों को बाहर निकलना होगा। बेशक यही जज़्बा गाँधी के इस देश को साम्प्रदायिक सद्भावना की राह पर ले जा सकता है। 

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