नरक की भट्टी से निकलती हैं चूड़ियां

महिलाओं की कलाई में चार चांद लगाने वाली चूड़ियों की खनन भले ही सुनने वालों के मन को गुदगुदा देते हों, लेकिन इन चूड़ियों के के उत्पादन के पीछे जो सच्चाई है, उसे जानकर हर मन कड़वा हो जाता है। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में कार्यरत लाखों चूड़ी मजदूरों को जिस नरकीय माहौल में रह कर खूबसूरत चूड़ियों के उत्पादन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उसकी कल्पना चूडी पहनने और खरीदने वाली महिलाएं शायद ही कर पाती होंगी। अधिकतर मजदूर महिलाएं हैं। उन्हें न केवल निर्धारित से कम मजदूरी पर काम करना पड़ रहा है बल्कि ऐसी विषय और नरकीय परिस्तियों में जीने का मजबूतर हैं, जिसे सुन कर मानवता शर्मशार हो जाए।

चूड़ी फैक्ट्रियों के मालिकों का मजदूरों पर अत्याचारों का आलम यह है कि उन्हें दोपहर का भोजन करने तक का समय नहीं दिया जाता और वे खाना खाने के लिए हाथ तक धोने नहीं जा सकते क्योंकि मालिकों को लगता है कि वे हाथ धोने जाएंगे तो कांच गलाने वाली भट्टी के जलते रहने के कारण र्इंधन के साथ समय की भी बर्बादी होगी।

वरिष्ठ सदस्य हेमानंद बिस्वाल की अध्यक्षता वाली श्रम और रोजगार मंत्रालय संबंधी स्थायी समिति ने मानसून सत्र में पेश अपनी 32वीं रिपोर्ट में चूड़ी कामगारों की बदहाली के आंकड़ें और हालात की कहानी बयां की है।

चूड़ी मजदूरों के शोषण का एक आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि जो चूड़ियां बाजार में एक दर्जन में 12 मिलती हैं, उसी एक दर्जन में चूड़ी फैक्ट्रियों के मालिक मजदूरों से 24 चूड़ियां बनवाते हैं। यह न केवल कामगारों बल्कि बाजार में उन चूड़ियोंं को खरीदने वाले उपभोक्ताओं का भी शोषण है।

 

प्राचीन है फिरोजाबाद का इतिहास

फिरोजाबाद के चूड़ी कारोबार के इतिहास के बारे में कहा गया है कि प्राचीन काल में विदेशी आक्रमणकारी कांच से बनी सुंदर कलात्मक वस्तुओं को लेकर भारत आए थे। जब इन वस्तुओं को बेकार करार दे दिया जाता तो उन्हें एकत्र कर फिरोजाबाद स्थित ‘भंैसा भट्ठी’ में डालकर गला लिया जाता था। इस प्रकार फिरोजाबाद में कांच उद्योग का उद्भव हुआ। इस समय अकेले फिरोजाबाद में चूड़ी का कारोबार प्रति वर्ष कई करोड़ रुपये का है। ऐसा अनुमान है कि तीन लाख से अधिक असंगठित कामगार फिरोजाबाद में चूड़ी एवं कांच उद्योग में योगदान देते हैं।

 

दस राज्यों में एक जैसा हाल

यूं तो आंध्र प्रदेश, बिहार, हरियाणा, झारखंड, राजस्थान और उड़ीसा समेत देश के दस राज्यों में चूड़ी बनाने का काम होता है लेकिन केवल आंध्र प्रदेश में इन कामगारों को सर्वाधिक 197 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिलती है। बिहार में इन्हें 144, झारखंड में 145 रुपये, उत्तराखंड में 144 तथा उड़ीसा में 92 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं। उधर चूडी उद्योग के सबसे बडेÞ केंद्र उत्तर प्रदेश में कामगारों को मजदूरी सबसे कम मिलती है और एक औसत आकार वाले परिवार को अधिकतम 80 रुपये तक दिये जाते हैं।

 

दो रुपये में 315 चूड़ियां

एक गुच्छे में 315 चूडियां होती हैं और एक गुच्छा पूरा करने के लिए परिवार को दो रुपये का भुगतान किया जाता है। एक औसत आकार वाला परिवार एक दिन में 40 गुच्छे पूरे करता है, जिसका अर्थ है 80 रुपये की आय।