हम कौन हैं ?

     त्रुबोध-शत्रुबोध का नारा लगाते-लगाते न शत्रु का बोध रहा और न ही अपना बोध रहा। हमारा शत्रु कौन है और हमारा मित्र कौन है, इन दोनों के बोध से पहले यह बोध होना आवश्यक है कि हम कौन हैं।

     हमें अपना ही पता नहीं कि हमारी दृष्टि क्या है, हमारे जीवनमूल्य क्या हैं, हमारी परम्परा क्या है, हमारा इतिहास क्या है, हमारा जीवनोद्देश्य क्या है और हम शत्रुबोध की बात करते हैं? हमारी दृष्टि, संस्कृति और जीवनोद्देश्य से जिसका विरोध है, जो उसे समाप्त कर देना चाहता है वह हमारा शत्रु है, लेकिन इसका बोध तो तब होगा जब हमें स्वयं हमारा बोध होगा। जब हमें अपना ही कुछ पता न हो तो हम किसे शत्रु माने और किसे मित्र, बिना स्वबोध के शत्रुबोध की बात करना अपनी सुविधा और लाभ के अनुसार खड़ा किया गया एक उत्तेजक भ्रम होता है।

     हमें दूसरों से अधिक खतरा स्वयं से है। जैसे प्रतिरक्षा कम होने के बाद कोई भी जीवाणु शरीर में प्रवेश कर रुग्ण कर सकता है वैसे ही स्वयं की पहचान (बोध) से रहित व्यक्ति को कोई भी प्रभावित कर सकता है। मतांतरण, लव जेहाद आदि ऐसी ही घटनाएं है जो जीवनमूल्य खो चुके व्यक्तियों को सहजता से प्रभावित करती हैं।

     हिन्दू समाज को संगठित होने से अधिक  उसे अपने जीवनमूल्यों के साथ दृढ़ता के साथ खड़े होने की आवश्यकता है। अपने जीवनमूल्य के प्रति गौरव-बोध और उसे जीने की चाह ही किसी समाज की सबसे बड़ी प्रतिरक्षा है वरना एक संगठित समाज भी जीवनमूल्य खोकर समाप्त हो जाता है।

     हिन्दू समाज बर्बर इसलामी आक्रमणों के कालखण्ड में किसी राज्य को पाने और खोने की लड़ाई से अधिक जीवनमूल्य की लड़ाई लड़ा। राज्य खोकर भी उसने अपने जीवनमूल्य को बचाए रखा। जिन्होंने जीवनमूल्य खो दिया, टूट गये वे मतांतरित हुए, लेकिन जिन्होंने जीवनमूल्य से समझौता करना नहीं स्वीकार किया वे जंगल, पहाड़ में आश्रय  लेकर और कुछ ने तो भंगी का काम स्वीकार कर भी अपने अस्तित्व की रक्षा करने में सफल रहे।

     भारत का तथाकथित मध्यकाल हिन्दू जागरण की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण कालखण्ड था। युद्ध के मैदान की पराजय नहीं समाज की चेतना के जागरण की दृष्टि से यह कालखण्ड अद्वितीय था। इस कालखण्ड में एक आश्चर्यजनक समाज खड़ा हुआ, जिसने इसलामी आक्रान्ताओं के सभी प्रयासों को परास्त कर दिया और हिन्दू सांस्कृतिक रूप से विजयी रहा। इस चेतना के पीछे संतों का आध्यात्मिक जागरण था। मध्यकाल में सन्त परम्परा की बाढ़ ने हिन्दू संस्कृति की गंगा को सूखने से बचा ही नहीं लिया अपितु अनेक नये आयामों का सृजन किया।

     हिन्दू संस्कृति का अमृत-तत्व उसकी अध्यात्म परम्परा में है, जिसके ध्वजवाहक आध्यात्मिक महापुरुष ही हो सकते हैं कोई राजनीतिक महामानव नहीं हो सकता। हिन्दू संगठन का अर्थ चेतना का संगठन है न कि पद और दायित्व के खींचा-तानी का संगठन। हिन्दू जितनी अपनी परम्पराओं को समझकर जीने का प्रयास करेगा उतना ही सुरक्षित रहेगा।

– डाॅ. चन्द्र प्रकाश सिंह

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

*