प्रेम भी अपरिपक्व होने लगा हैं

प्रेम भी अपरिपक्व होने लगा हैं


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स्त्री की देह तालाब-सी है, बिल्कुल ठहरी हुई सी उसमे नदी के मानिंद वेग और चंचलता कुछ नहीं फिर भी पुरुष उस ...