विचारक बजरंग मुनि
पूरी दुनिया में एक तरफ कायरता बढ़ रही है और दूसरी तरफ हिंसा भी बढ़ रही है यह दोनों ही बातों का एक साथ बढ़ना वर्तमान समाज की बहुत बड़ी समस्या है । करीब करीब ऐसा ही हाल भारत का भी है । ऐसा ही हाल ईरान का भी है । कुछ पश्चिम के देशों में यह अंतर कम है लेकिन अन्य देशों में बहुत अधिक है यही कारण है कि भारत में भी आम लोगों की अवधारणा बनती जा रही है कि वह मजबूत के सामने कायर बन जाते हैं और कमजोर के सामने हिंसक हो जाते हैं। धरातल पर हिंदुओं और मुसलमान में थोड़ा सा अंतर होता है कि हिंदू आमतौर पर या तो कायर होता है या अहिंसक होता है मुसलमान आमतौर पर हिंसक होता है।
मुसलमान में जो भी आदमी बल प्रयोग का पक्षधर होता है उसके पक्ष में आम मुसलमान जुड़ जाता है क्योंकि उनके जीवन शैली में ही कट्टरता घुसी हुई है । भारत में भी हिंदुओं के बीच धीरे-धीरे कुछ ऐसे ही संस्कार बढ़ते जा रहे हैं ।भारत में भी जो हिंदू धर्म गुरु हिंसा की बात करता है बल प्रयोग का समर्थन करता है उसके साथ देने वाले बड़ी संख्या में खड़े हो जाते हैं लेकिन यह एक सामाजिक कमजोरी है। हम विचारकों का कर्तव्य है कि हम इस समस्या का समाधान करें । मुस्लिम आतंकवाद को दबाने के लिए हमें हिंदू एक जुटता चाहिए लेकिन उस एक जुटता का नेतृत्व हिंसक हिंदुओं के हाथ में नहीं होना चाहिए ।
यह विशेष सावधानी रखने की जरूरत है क्योंकि आज अगर दुनिया में मुसलमान सबसे ज्यादा परेशान है तो सिर्फ एक बात से है कि उसने इस्लाम धर्म को आगे बढ़ाने के लिए उग्रवादी कट्टरवादी मुसलमान को प्राथमिकता दी। यही आज उनके गले की हड्डी बन गया है। इसलिए हमें ईरान युद्ध से यह सबक सीखना चाहिए कि हम भारत के हिंदू भी कभी कट्टर वादियो के नेतृत्व में समस्या का समाधान नहीं करेंगे । हमारा जो भी निर्णय होगा सोच समझ कर होगा सूझबूझ से होगा भावनाओं के आधार पर नहीं।


