बजरंग मुनि
अमेरिका और ईरान का युद्ध लगातार चल रहा है। कौन जीतेगा कौन हारेगा यह अभी निश्चित नहीं है लेकिन एक बात निश्चित है कि ईरान ने लड़कर मूर्खता की है । यह बात जग जाहिर है की दुनिया में दो ही शक्तियां हैं एक है लोकतांत्रिक ताकत और दूसरी है तानाशाही ताकत। लोकतांत्रिक ताकत के रूप में आप अमेरिका के नेतृत्व को मान सकते हैं और तानाशाही की ताकत के रूप में चीन के नेतृत्व को मान सकते हैं। दोनों के बीच में कुछ चूहे भी जीवित रह सकते हैं जो दोनों के साथ अच्छे संबंध रखकर बीच में स्वतंत्र रह सकते हैं। इस प्रकार के लोगों में अनेक मुस्लिम देश भी हैं भारत भी है और भी अनेक देश हैं लेकिन ईरान ने अकड़ने की गलती की। उसने एक तीसरी शक्ति बनने का प्रयास किया और उस प्रयास की उसके पास शक्ति नहीं थी। आप सोचिए कि ईरान को अपने नागरिकों पर हिजाब पहनने के लिए इतनी गुंडागर्दी करने की क्या जरूरत थी क्या दुनिया आंख बंद करके इस गुंडागर्दी को स्वीकार कर ले। ईरान को क्या जरूरत थी कि वह हिज्बुल्लाह हमास हूती इस तरह के संगठन खड़े करके अन्य देश में अस्थिरता पैदा करता। क्या दुनिया अंधी है जो ईरान की इस गलती को नहीं देखेगी ।
मैं मानता हूं कि ईरान को यह विश्वास था कि अमेरिका लोकतांत्रिक देश है और इसलिए अमेरिका उसके साथ अन्याय नहीं करेगा गुंडागर्दी नहीं करेगा लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि अमेरिका में ट्रंप सरीका कोई दादा प्रधानमंत्री नहीं बन जाएगा और यदि बन गया तो क्या गारंटी है कि उस दादा से लड़कर तुम जिंदा रह पाओगे। इसलिए ईरान ने अपनी ताकत को भुलाकर अकड़ने की कोशिश की है अमेरिका से अकड़ कर वियतनाम अफगानिस्तान क्यूबा यह देश आज तक खड़े नहीं हो पाए हैं इसलिए ईरान को इन घटनाओं से सबक सिखना चाहिए था । मैं यह बात नहीं कह रहा कि अमेरिका लोकतांत्रिक कार्य कर रहा है मैं यह भी नहीं कह रहा कि ट्रंप सही कर रहे हैं लेकिन मैं इतनी बात जरूर कह रहा हूं कि ईरान ने वर्तमान परिस्थितियों में मूर्खता की है। जिस समाज में न्याय अन्याय का निपटारा शेर करते हो उस समाज में अपनी ताकत समझे बिना उछल कूद करना मूर्खता ही मानी जाएगी। ईरान को नरेंद्र मोदी से शिक्षा लेनी चाहिए थी।
(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


