विश्व में अशांति का ठेका और नोबल शांति पुरस्कार की इच्छा ?

     अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ज़िद,सनक और हठधर्मी ने इस समय लगभग पूरी दुनिया को एक ख़तरनाक युद्ध में झोंक दिया है। अमेरिका व इस्राईल द्वारा अकारण ईरान पर थोपा गया एक ऐसा युद्ध जिसके अंजाम को लेकर विश्व के बड़े बड़े सामरिक विशेषज्ञ भी कोई भविष्यवाणी कर पाने में असमर्थ हैं। ईरान, इस्राईल और अमेरिका के बीच चल रहे इस युद्ध की लपटें फ़िलहाल मध्य पूर्व से भी आगे तक फैल चुकी हैं। लगभग 20 से अधिक देश इस युद्ध से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो चुके हैं। गत 28 फ़रवरी से शुरू हुये इस युद्ध में अब तक हज़ारों निर्दोष लोगों की मौतें हो चुकी हैं। इसी युद्ध के परिणाम स्वरूप जहाँ ईरान ने अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामनेई को खो दिया है वहीँ युद्ध छिड़ने के पहले ही दिन यानी 28 फ़रवरी की सुबह को ही ईरान के दक्षिणी शहर मिनाब में अमेरिका और  इस्राईल ने शाज़ारे तैय्यबह गर्ल्स प्राइमरी स्कूल पर उस वक़्त हमला किया जब बच्चियां अपने अपने क्लास में पढ़ रही थीं। इस हमले में 175 तक छात्राएं मारी गयीं जिनमें अधिकांश की उम्र 7-12 साल की थी। स्कूल का दो मंज़िला भवन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा ईरान पर थोपा गया यह  युद्ध किसी न किसी रूप में कुवैत इराक़ ,बहरीन,सऊदी अरब,यूएई,ओमान,क़तर,जॉर्डन,तुर्की,अज़रबैजान,साइप्रस व यमन तक पहुँच गया है। यहाँ तक कि भारत – श्रीलंका के समुद्रीय क्षेत्र में भी अमेरिकी पनडुब्बी ने समुद्री हमला कर भारत में अतिथि के रूप में आये ईरान के एक नेवल जहाज़ को डुबो दिया है। अमेरिका- इस्राईल की इन सैन्य कार्रवाइयों से जहाँ पूरे विश्व की ऊर्जा ज़रूरतों के प्रभावित होने की संभावना है वहीं बढ़ते तेल संकट और विभिन्न हवाई क्षेत्र बंद होने से भी इस युद्ध का वैश्विक प्रभाव पड़ा है।

     पूरे विश्व में दिनोंदिन फैलती जा रही इस अशांति के सबसे बड़े ज़िम्मेदार केवल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप उनकी हठधर्मिता उनकी सनक व ज़िद को माना जा रहा है। जी हाँ, यह वही ट्रंप हैं जो अपने आप को 'स्वयंभू विश्व शांति दूत ' समझते हैं और विश्व का सबसे प्रतिष्ठित समझा जाने वाला नोबल शांति पुरस्कार पाने हेतु हमेशा लालायित नज़र आते रहे हैं। उन्होंने समय समय पर न केवल नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त करने की इच्छा कई बार सार्वजनिक रूप से व्यक्त की है बल्कि इसके लिए सक्रिय रूप से प्रयास भी किए हैं। वे स्वयं को इस पुरस्कार के योग्य समझते हुये कहते भी रहे है कि  "मैं इसका हक़दार हूं" I ट्रंप ने तो 2017-2021 के अपने पहले कार्यकाल से ही नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने की इच्छा जतानी शुरू कर दी थी। जोकि उनका दूसरा कार्यकाल आते आते 2025 में और अधिक तीव्र हो गई। अपने इस दावे के पक्ष में वे अपने शासनकाल की अमेरिकी विदेश नीति के फ़ैसलों को पेश किया करते थे। हालांकि ट्रंप कई अवसरों पर यह भी कह चुके हैं कि वे नोबल शांति पुरस्कार के हक़दार तो ज़रूर हैं परन्तु उन्हें लगता है कि इस पुरस्कार का निर्णय करने वाली नॉर्वेजियन नोबल कमेटी यह पुरस्कार उन्हें कभी नहीं देगी। जबकि 2025 में तो ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र की सभा में यह कहा था कि "हर कोई कहता है कि मुझे नोबल शांति पुरस्कार मिलना ही चाहिए।

     हद तो यह है कि ट्रंप ने इस पुरस्कार के लिये इस तरह की बातें कीं यहाँ तक कि अपने असहज करने वाले बयानों से नोबल कमेटी पर इसके लिये दबाव बढ़ाने की कोशिश की जो नोबेल शांति पुरस्कार के इतिहास में इसके पहले किसी भी दावेदार द्वारा नहीं की गयी। उदाहरण के तौर पर एक बार उन्होंने अमेरिकी सैनिकों से बातचीत के दौरान कहा कि "वे (नॉर्वेजियन नोबेल कमिटी) इसे किसी ऐसे व्यक्ति को देंगे जिसने कुछ नहीं किया, लेकिन मुझे नहीं देंगे, जबकि मैं इसके योग्य हूं।" इसके अलावा ट्रंप ने नॉर्वे के वित्त मंत्री जेन्स स्टोल्टेनबर्ग जोकि पूर्व नाटो प्रमुख भी हैं, को फ़ोन कर यह पुरस्कार हासिल करने के लिए लॉबिंग की। उन्होंने 2025 में  इस्राईली बंधकों के परिवारों से भी उन्हें पुरस्कार देने की अपील कराई। ट्रंप को  इस्राईली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू व पाकिस्तान द्वारा इस पुरस्कार हेतु नामांकन भी कराया गया। ट्रंप स्वयं को विश्व शांतिदूत इसलिये समझते थे कि उनका दवा था कि उन्होंने विश्व में 8 युद्ध समाप्त किए। इन दावों के समर्थन वे  इस्राईल और हमास के बीच गज़ा युद्ध में सीज़ फ़ायर डील, रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की कोशिशें, इस्राईल -ईरान, भारत-पाकिस्तान, थाईलैंड-कंबोडिया, और अज़रबैजान-अल्बानिया के बीच संघर्ष रुकवाने जैसे दावे करते रहे हैं। हालांकि इनमें से कई दावे हास्यास्पद भी हैं। क्योंकि इनमें से कई जगह या तो युद्ध अभी भी जारी हैं या फिर इनमें अमेरिका (ट्रंप ) की कोई निर्णायक भूमिका नहीं थी। या फिर कुछ देश 'ट्रंप हस्तक्षेप या मध्यस्थता ' मानने को तैयार नहीं।

      दूसरी तरफ़ आंकड़े यह बताते है कि इसी 'स्वयंभू शांतिदूत ' के कार्यकाल में 2017 में अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों से इराक़, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान और यमन में 499 नागरिकों की मौत हुई। इन्हीं के कार्यकाल में अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध ने 2,463 अमेरिकी सैनिकों और नागरिकों की जान ली। इसी तरह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में 2025-2026 के दौरान ईरान और वेनेज़ुएला जैसे देशों पर हमले किये गये। वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरै को उनकी पत्नी सहित अपहृत कर अमेरिका ले जाया गया। 2025 में अलक़ायदा के एक दुर्दांत आतंकी सरग़ना अहमद हुसैन अल शरा को सीरिया का राष्ट्रपति थोप दिया गया। क्योंकि राष्ट्रपति निकोलस मदुरै की ही तरह पूर्व राष्ट्रपति बशर अलअसद, भी ट्रंप व अमेरिका के पिछलग्गू नहीं थे। और अब ट्रंप ने इस्राईल से अपनी 'दोस्ती ' निभाते हुये ईरान को एक बार फिर ऐसे युद्ध में लपेट लिया है जहाँ विनाश का अभूतपूर्व इतिहास लिखा जा रहा है। और निःसंदेह इस विनाश के जनक और कोई नहीं बल्कि केवल 'स्वयंभू विश्व शांतिदूत ' राष्ट्रपति ट्रंप ही हैं।   

     केवल तेल संपदा पर नियंत्रण के लिये वेनेज़ुएला से लेकर ईरान तक और ईरान युद्ध के चलते विश्व में अशांति फैलाने वाले ट्रंप का 'नोबेल शांति पुरस्कार' के लिए इस क़द्र मचलना वास्तव में हैरान करने वाला है। ख़ासकर तब और भी अधिक जबकि एप्सटीन फ़ाइल्स में उनके कथित कारनामे न केवल पूरे अमेरिका बल्कि पूरी मानवता को शर्मसार करने वाले हो सकते हैं। ट्रंप का क़त्लो ग़ारत का यह मिशन अभी पूरा नहीं हुआ है क्योंकि वे स्वयं ईरान के बाद अब क्यूबा पर हमले की योजना बना रहे हैं। गोया एक तरफ़ तो ट्रंप ने पूरे विश्व में अशांति फैलाने का ठेका भी ले रखा है और दूसरी तरफ़ नोबेल शांति पुरस्कार की इच्छा भी पाले हुये हैं ?

                                                               

     

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