क्यों हो रही है योगी की छवि धूमिल करने की राजनीति

     समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इन दिनों मोदी-योगी और बीजेपी के तमाम नेताओं के खिलाफ अपनी तीखी भाषा और तंज भरी शैली के चलते राजनीतिक हलकों में छाए हुए हैं। वे लगातार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधते रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस के राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हैं। अखिलेश, सीएम योगी की छवि को धूमिल करने के लिए हर मौके को हथियार बनाते हैं। योगी की वेशभूषा पर सवाल उठाते हैं तो उनकी क्षमता पर भी चोट करते हैं। उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था की तारीफ देश-दुनिया कर रही हो, अखिलेश उसी पर तंज कसते हैं। भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं, निवेश प्रयासों का मजाक उड़ाते हैं। यहां तक कि योगी के विदेश दौरों को भी निशाने पर लेते हैं। वे उपमुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक के बीच कलह की अफवाहें फैलाते हैं। उन्हें सौ विधायक लाने और मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव देते रहते हैं। अब तो यह भी कह रहे हैं कि 2027 का विधानसभा चुनाव नहीं होगा, बल्कि 2029 का लोकसभा चुनाव ही होगा। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने भी योगी पर प्रहार कर रहे हैं। ये सारी बातें अखिलेश की रणनीति का हिस्सा लगती हैं, जो योगी सरकार को कमजोर दिखाने पर तुली हुई हैं।

      खैर, राजनीति में बयानबाजी का यह खेल पुराना है, लेकिन अखिलेश इसे एक कला बना चुके हैं। वे हर सार्वजनिक मंच पर योगी को निशाना बनाते हैं। योगी जब भी कोई नया कदम उठाते हैं, अखिलेश तुरंत उस पर सवाल खड़े कर देते हैं। मसलन, योगी के विदेश भ्रमणों को वे व्यर्थ बताते हैं। कहते हैं कि ये दौरें केवल दिखावा हैं, असल में प्रदेश का विकास रुका हुआ है। निवेश सम्मेलनों का भी वे मजाक उड़ाते हैं। दावा करते हैं कि ये सब आंकड़े काल्पनिक हैं, जमीन पर कुछ नहीं हो रहा। कानून व्यवस्था पर तो उनकी बोलचाल में सबसे ज्यादा तीखापन आता है। योगी सरकार जब अपराध पर सख्ती की बात करती है, अखिलेश पुराने आंकड़े निकालकर हमला बोलते हैं। कहते हैं कि अपराधी अभी भी खुले घूम रहे हैं, पुलिस की कार्रवाई केवल नाम की है। भ्रष्टाचार के आरोप तो वे रोजमर्रा की बात की तरह लगाते हैं। विभागों पर भ्रष्टाचार का ठप्पा लगाते हैं,अधिकारियों को निशाना बनाते हैं। योगी की वेशभूषा पर तंज कसना उनका पुराना शगल है। भगवा वस्त्रों को लेकर व्यंग्य करते हैं, कहते हैं कि यह आडंबर है, असली सेवा जमीन पर दिखानी चाहिए। इन तमाम हमलों से योगी की साफ-सुथरी छवि पर ग्रहण लगाने की कोशिश साफ झलकती है।

     अखिलेश की रणनीति में उपमुख्यमंत्रियों को शामिल करना नई चाल है। वे केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक के बीच दरार की कहानियां गढ़ते हैं। कहते हैं कि योगी के नेतृत्व में ये दोनों असहज हैं। उन्हें बार-बार ललकारते हैं सौ विधायक लाओ, मुख्यमंत्री बन जाओ। यह बयान भाजपा के अंदर कलह फैलाने का प्रयास है। अखिलेश जानते हैं कि भाजपा की एकजुटता ही उसकी ताकत है। इसलिए वे छोटे-छोटे बीज बोकर दरार पैदा करने की कोशिश करते हैं। मौर्य और पाठक को निशाना बनाना इसलिए आसान है क्योंकि वे पिछड़े वर्ग और अन्य समुदायों के प्रतिनिधि हैं। अखिलेश इनके माध्यम से समाजवादी समर्थकों को लुभाने का प्रयास करते हैं। योगी पर सीधा हमला न हो सके तो अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को कमजोर दिखाते हैं। यह चाल चाणक्य नीति जैसी लगती है, जहां शत्रु को अंदर से तोड़ा जाता है। भाजपा कार्यकर्ता इन बयानों से भड़कते हैं, लेकिन अखिलेश को इससे सुर्खियां मिलती हैं। मीडिया इन बयानों को प्रमुखता से दिखाता है, जिससे अखिलेश का संदेश दूर-दूर तक फैलता है।

     सबसे चौंकाने वाला बयान तो 2027 के विधानसभा चुनाव न होने का है। अखिलेश कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में अब विधानसभा चुनाव नहीं होगा, 2029 का लोकसभा चुनाव ही मुख्य होगा। यह बयान केंद्र और राज्य की सत्ता पर सवाल उठाता है। विपक्षी नेता इसे लोकतंत्र पर हमला बताते हैं, लेकिन अखिलेश इसे हथियार बनाते हैं। वे कहते हैं कि भाजपा चुनाव से डर रही है, इसलिए इसे टालने की साजिश रच रही है। यह दावा आधारहीन लगता है, लेकिन अखिलेश के समर्थकों में उत्साह भर देता है। वे इसे योगी सरकार की नाकामी का प्रमाण बताते हैं। वास्तव में यह बयान भविष्य की राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास है। 2027 का चुनाव भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि योगी की लोकप्रियता परखी जाएगी। अखिलेश पहले से ही प्रचार शुरू कर चुके हैं। समाजवादी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए यह बयान हवा में आग लगाने जैसा है। विपक्षी दल इसे दोहराते हैं, जिससे माहौल गरमाता जाता है। अखिलेश की यह शैली उन्हें युवा वोटरों का चहेता बनाती है। उनकी भाषा सरल, तीखी और याद रखने लायक होती है।

      शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का मुद्दा उठाकर अखिलेश ने धार्मिक भावनाओं को भी छुआ है। शंकराचार्य ने योगी सरकार पर आलोचना की, तो अखिलेश ने इसे पकड़ लिया। वे कहते हैं कि धार्मिक नेता भी योगी से नाराज हैं। यह बयान हिंदू वोट बैंक को भेदने की कोशिश है। योगी की हिंदुत्व छवि मजबूत है, लेकिन अखिलेश इसे कमजोर करने पर तुले हैं। शंकराचार्य के बहाने वे कहते हैं कि योगी धार्मिक मामलों में भेदभाव करते हैं। यह प्रहार सीधा सीने पर है। उत्तर प्रदेश में धर्म का महत्व बहुत है, इसलिए अखिलेश इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। वे हर धार्मिक आयोजन पर योगी को घेरते हैं। राम मंदिर निर्माण हो या काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, इनका श्रेय योगी को देते हुए भी कमियां निकालते हैं। अखिलेश की यह रणनीति लंबे समय से चल रही है। मुलायम सिंह यादव के जमाने से समाजवादी पार्टी विपक्ष की भूमिका निभाती रही है। लेकिन अखिलेश ने इसमें आधुनिकता जोड़ी है। सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं, छोटे वीडियो बनवाते हैं। उनके बयान वायरल होते हैं, लाखों लोग देखते हैं।

     दरअसल, योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता अखिलेश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। योगी ने पांच साल में विकास के कई काम किए हैं। सड़कें बनीं, बिजली पहुंची, अपराध पर नियंत्रण हुआ। निवेश सम्मेलनों से अरबों के प्रस्ताव आए। लेकिन अखिलेश इन सबको नकारते हैं। वे कहते हैं कि ये सब कागजी हैं, किसानों की हालत खराब है। बेरोजगारी बढ़ रही है, युवा परेशान हैं। महंगाई पर भी तंज कसते हैं। योगी के बुलडोजर अभियान को अन्याय बताते हैं। कहते हैं कि निर्दोषों के घर तोड़े जा रहे हैं। यह मुद्दा पिछड़े इलाकों में गूंजता है। इन्हीं बयानों के सहारे अखिलेश समाजवादी पार्टी को पुनर्जनन देने के लिए संघर्षरत हैं। 2017 में हार के बाद 2022 में फिर हार मिली। अब 2027 की तैयारी में जुटे हैं। उनकी तंज शैली वोटरों को जोड़ती है। खासकर यादव और मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करती है। वे योगी को चुनौती देते हैं बहस हो तो आओ। लेकिन बहस से बचते हैं।

अखिलेश की भाषा में व्यंग्य का पुट ऐसा है कि सुनने वाले हंसते भी हैं और सोचने पर मजबूर हो जाते हैं। वे योगी को महंत कहकर चिढ़ाते हैं। कहते हैं कि महंत साधु हैं, राजनीति में क्या करेंगे। वेशभूषा पर तंज मारते हुए कहते हैं कि भगवा पहनकर विकास नहीं होता। केशव प्रसाद मौर्य को ललकारते हुए कहते हैं कि साहब, साहब कहना बंद करो, सत्ता संभालो। ब्रजेश पाठक को चेतावनी देते हैं कि योगी के डर से मत डरो। ये बयान भाजपा के अंदर खलबली मचा देते हैं। योगी शांत रहते हैं, लेकिन उनके समर्थक जवाब देते हैं। राजनीतिक बहस तेज हो जाती है। अखिलेश को इससे फायदा होता है। वे विपक्ष के चेहरा बन चुके हैं। अन्य दल उनके पीछे आते हैं।

यह सारी रणनीति 2027 के चुनाव के लिए है। अखिलेश जानते हैं कि योगी मजबूत हैं, लेकिन कमजोरियां ढूंढनी हैं। कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी ये मुद्दे उठाकर वे वोटरों को लुभाते हैं। शंकराचार्य का मुद्दा धार्मिक वोट प्रभावित करेगा। उपमुख्यमंत्रियों पर हमला भाजपा को बांटेगा। चुनाव न होने का दावा भय पैदा करेगा। अखिलेश की तंज शैली उन्हें अलग बनाती है। वे भाषणों में कविताएं सुनाते हैं, मुहावरों का इस्तेमाल करते हैं। युवा उन्हें पसंद करते हैं। सोशल मीडिया पर उनके क्लिप्स ट्रेंड करते हैं। समाजवादी पार्टी को नई ऊर्जा मिल रही है। योगी सरकार को सतर्क रहना होगा। अखिलेश के हमले तेज होंगे। राजनीति का यह युद्ध जारी रहेगा। उत्तर प्रदेश की सियासत में रोमांच बना रहेगा। अखिलेश यादव सुर्खियों के सितारे बने रहेंगे।

 

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