चीन की दबंगई का जवाब है हमारे पास

सिक्किम के डोकालम इलाके में पिछले कुछ समय से भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने हैं। यहां तीन देशों भारत, चीन और भूटान की सीमाएं मिलती हैं।

चीन ने यहां सड़क बनाने की कोशिश की थी। लेकिन भारत और भूटान ने इसका विरोध किया है। इस समय डोकालम इलाके में भारत और चीन की सेनाएं 120 मीटर की दूरी पर आमने-सामने हैं। फिलहाल माना जा रहा है कि अभी टकराव बढ़ने के आसार नहीं हैं। वैसे भी इस इलाके में चीनी सेना कम ही आती रही है। भारत के विरोध पर चीन ने हेकड़ी दिखाते हुए 1962 के युद्ध की याद दिलाई तो हमारे रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने करारा जवाब दिया कि अब 2017 का भारत है। चीन से भारत का विवाद लंबे समय से चल रहा है। 1988 में दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिये संबंधों में सुधार हुआ पर पिछले दस साल से चीन के साथ कई कारणों से संबंधों में तनाव जारी है। चीन को भारत की सैन्य शक्ति के बारे में भी पता है, इसलिए केवल फिलहाल धमकाने की कोशिश कर रहा है। इसी कारण चीन को लेकर भारत हमेशा सतर्कता बरतता रहा है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद 1959 से चल रहा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के हिन्दी-चीनी, भाई-भाई के नारे के बावजूद जमीन कब्जाने के लिए चीन ने 1962 में भारत पर हमला कर दिया। हम हारे तो रिश्तों में भी लंबे समय तक तल्खी जारी रही। 1988 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन जाकर सीमा विवाद सुलझाने और आर्थिक संबंध बनाने की पहल की।

ताजा विवाद में चीन ने सिक्किम को लेकर को लेकर भी कड़ा बयान दिया है। चीन की तरफ से धमकी दी गई है कि भारतीय सेना अगर पीछे नहीं हटी तो सिक्किम की आजादी का मुद्दा उठाया जाएगा। इस तरह की खबरें भी मीडिया में आई हैं कि पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में अलग गोरखालैंड बनाने की मांग को लेकर जारी आंदोलन को भड़काने में चीन का हाथ है। साथ ही भारत-चीन के बीच जारी विवाद के दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की चीन के राजदूत से मुलाकात के बाद यह विवाद और गर्म हो गया है। राहुल गांधी की चीन के राजदूत से हुई मुलाकात को पहले छिपाने और बाद में पुष्टि करने पर सवाल खड़े हो रहे हैं। भारत सरकार के चीन के प्रति कड़ा रवैया अपनाने के बावजूद राहुल गांधी की चीनी राजदूत से मुलाकात को शंका की नजर से देखा जा रहा है। कांग्रेस राहुल गांधी के बचाव में जो तर्क दे रही हैं, वे भी बड़े बचकाने हैं। केंद्रीय मंत्रियों के चीन के दौरे पर सवाल उठायें जा रहे हैं। यह तो जगजाहिर है कि चीन के साथ अन्य मामलों में सरकार के प्रतिनिधि दौरे करते रहे हैं, चीन के प्रतिनिधि भी भारत आते रहे हैं।

चीन के साथ पिछले लंबे अरसे कई मुद्दों पर भारत के साथ टकराव रहा है। दलाई लामा को शरण देने के सवाल पर चीन भारत को धमकाता रहा है। तिब्बत को लेकर भी चीन के साथ भारत का टकराव रहा है। 1950 में चीन ने ल्हासा पर कब्जा करन के लिए सेना भेजी। 1959 में चीनी सेना के कब्जे के बाद दलाई लामा को भारत में शरण दी गई तो चीनी सरकार भड़क गई। चीन सिक्किम और भूटान के हिस्सों को लेकर भी दादागिरी दिखाता रहा है। अब भी हमारी जमीन चीन के कब्जे में हैं। अरुणाचल प्रदेश को लेकर भी चीन अपना अधिकार जताता रहा है। विवाद को बढ़ाने के लिए अरुणाचल के लोगों को नत्थी वीसा देता रहा है। चीन के भारत के साथ ही नहीं कई अन्य देशों के साथ भी जमीन कब्जाने को लेकर विवाद जारी है। चीन की जमीनी सीमा 22000 किमी की है और कोरिया, रूस, मंगोलिया, कजाखिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, म्यांमार, लाओस और वियतनाम के साथ चीन की सीमाएं मिलती हैं।पाकिस्तान के साथ चीन की सीमा नहीं मिलती है पर इसके बावजूद तीन ने पाक अधिकृत कश्मीर के जरिये पाकिस्तान को पड़ोसी बना रखा है। ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया, ताइवान और जापान की जमीनों पर भी चीन ने कब्जा कर रखा है। चीन की दबंगई के कारण ये देश भी परेशान हैं। डोकलाम विवाद पर चीन ने भूटान को भारत का साथ छोड़ने का प्रस्ताव रखा है। भूटान चीन की सारी चालें समझ रहा है। भूटान को पता है कि भारत का साथ छोड़ने पर चीन की सेना राजधानी राजधानी थिम्पू को जोड़ने वाले मुख्य मार्गों पर कब्जा जमा सकती है। यह माना जा रहा है कि 'यदि चीनी सैनिक डोकलाम समेत विवादित इलाके पर दावा करते हैं तो वे हिमालय की ऊंची चोटियों पर भी कब्जा कर सकते हैं।

चीन हमें धमका जरूर रहा है पर इससे हमें कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। डोकालम में जरूर चीन ने डेरा जमाया है पर वहां भी ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाएगा। चीन की धमकी के बाद भारत चीन में बने सामानों को खरीदने का बहिष्कार शुरु करने का आह्वान किया जा रहा है। चीन की धमकी जवाब हमारे विदेश मंत्री ने तो दे दिया और अब जनता भी चीनी सामान का बहिष्कार करके दे सकती है। केंद्र की मोदी सरकार देश में लगातार उद्योग लगाने का प्रयत्न कर रही है। देश में विदेशी पूंजी निवेश भी बढ़ रहा है। मेक इन इंडिया योजना तेजी से आगे बढ़ रही है। अब हमें चीन से नहीं बल्कि चीन को हमसे खतरा है। चीन ने कुछ किया तो दोनों के देशों के व्यापार पर सीधा असर पड़ेगा। भारत और चीन के बीच वर्ष 2016-17 में 71.18 अरब डॉलर का व्यापार इसमें चीन का हिस्सा 59.43 अरब डॉलर और भारत की 11.75 अरब डॉलर है। युद्ध हुआ तो चीन को खामियाजा भुगतना पड़ेगा। चीन को मालूम है कि भारत उसके लिए मोबाइल, टीवी, चार्जर, म्यूजिक सेट, ऑटो एसेसरीज, बिल्डिंग मैटीरियल, सेनटरी आइटम, टाइल्स, मशीने, आयरन-स्टील, खिलौने , केमिकल आदि के लिए बड़ा केंद्र हैं। चीनी कंपनियों का व्यापार भारतीय बाजार पर ही टिका है। चीन लगातार भारत में कारोबार बढ़ाने में लगा हुआ है। ऐसे में चीन की तरफ कोई युद्ध का ऐलान किया गया तो हमारी चौकस और मजबूत सेना तो सीमा पर जवाब देगी कि जनता भी चीन को सबक सिखाएगी।

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