श्रीकृष्‍ण भगवान की जीवन लीला

           जब-जब पृथ्‍वी पर अत्‍याचार बढ़ता हैै तब-तब प्रभु इस धरा पर अवतरित होते हैंं

जब-जब धर्म का पतन होता है तब-तब धर्म के उत्‍थान के लिए प्रभु का अवतरण होता है। साधुओं की रक्षा व दुष्‍टों के विनाश के लिए एवं धर्म की स्‍थापना के लिए हर युग में प्रभु इस धरा पर अवतरित होते हैं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

अभ्युथानमधर्मस्य तदात्मानम श्रजाम्यहम ।।

परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।

      भगवान कृष्‍ण का जन्‍म इसी परिप्रेक्ष्‍य में हुआ।

जब-जब इस पृथ्वी पर असुर एवं राक्षसों के पापों का आतंक व्याप्त होता है तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी पर हो रहे पाप से मुक्‍त करवाते हैं। श्रीकृष्‍ण को भगवान श्री  विष्‍णु का अवतार माना जाता है । वैसे तो भगवान विष्णु ने अभी तक तेईस अवतारों में अवतरित हुए हैं किन्‍तु इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण के ही माने जाते हैं। प्रभु श्री कृष्ण का जन्मयदुवंशी क्षत्रिय कुल में राजा वृष्णि के वंश में हुआ था ।

ज्ञात हो कि यह अवतार उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में लिया था। ये तो एक ईश्‍वर की एक लीला है कि भगवान गर्भ से जन्‍म लिया लेकिन सच्‍चाई यह है कि प्रभु प्रकट होते हैं । यद्यपि राम जन्‍म के बारे में कहा जाता है कि श्रीरामजन्‍म स्‍थल किन्‍तु सही मायने में गोस्‍वामी तुलसी दास नें क्‍या लिखा है – ”भये प्रकट कृपाला दीन दयाला, कौशल्‍या हितकारी”।

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 सच्‍चाई यह थी कि इस समय चारों ओर घोर पापाचार मचा था । धर्म के नाम पर लोग अधर्म कर रहे थे । इसी हेतु  धर्म को स्थापित करने के लिए श्रीकृष्ण अवतरित हुए थे। ब्रह्मा तथा शिव -प्रभृत्ति देवता जिनके चरणकमलों का ध्यान करते थे, ऐसे श्रीकृष्ण का गुणानुवाद अत्यंत पवित्र है। श्रीकृष्ण से ही प्रकृति उत्पन्न हुई। सम्पूर्ण प्राकृतिक पदार्थ, प्रकृति के कार्यकार्य किया उसे अपना महत्वपूर्ण कर्म समझा, अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग किया, क्योंकि उनके अवतीर्ण होने का मात्र एक उद्देश्य था कि इस पृथ्वी को पापियों से मुक्त किया जाए।

संपूर्ण पृथ्वी दुष्टों एवं पतितों के भार से त्राहि माम्- त्राहि माम् कर रही थी। उसके कष्‍ट को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने एक प्रमुख अवतार ग्रहण किया जो कृष्णावतार के नाम से सारे संसार में जाना जाता है । उस समय धर्म, यज्ञ, दया पर राक्षसों एवं दानवों द्वारा अत्‍यंत मर्मांतक प्रहार किया जा रहा था ।

पृथ्वी पापियों के बोझ से नीचे दबी जा रही थी इसे देखते हुए सारे देवताओं द्वारा अनंत बार  भगवान विष्णु के समक्ष गुहार लगाए जा रहे थे । विष्णु ही ऐसे देवता थे, जो समय-समय पर विभिन्न अवतारों को ग्रहण कर पृथ्वी के भार को दूर करने में सक्षम थे क्योंकि प्रत्येक युग में भगवान विष्णु ने ही महत्वपूर्ण अवतार लेकर  दुष्ट राक्षसों का समूल संहार किया। ध्‍यान रहे कि हिन्दू कालगणना के अनुसार कृष्ण का जन्म आज से लगभग 5,235 वर्ष पूर्व हुआ था, कई वैज्ञानिकों तथा पुराणों का यही मानना है। जो महाभारत युद्ध की कालगणना से मेल खाता है।

पुराणों में वर्णित  है कि जब श्री कृष्ण का स्वर्गवास हुआ तब कलयुग का आगमन हुआ, इसके अनुसार कृष्ण जन्म 4,500 से 3,102 ई° पूर्व के बीच मानना ठीक रहेगा। इस गणना को सत्यापित करने वाली खोज मोहनजोदाड़ो सभ्यता के विषय में 1929 में हुई। मैके द्वारा मोहनजोदाड़ो में हुए उत्खनन में एक पुरातन टैबलेट (भित्तिचित्र) मिला जिसमें दो वृक्षों के बीच खड़े एक बच्चे का चित्र बना हुआ था, जो हमें भागवत आदि पुराणों में लिखे कृष्ण द्वारा यमलार्जुन के उद्धार की कथा के ओर ले जाता है। इसके अनुसार महाभारत का युद्ध 3000 ई° पूर्व हुआ होगा जो पुराणों की गणना में सटीक बैठता है। इससे कृष्ण जन्म का सटीक अंदाजा मिलता है। कुछ विद्वानों के अनुसार हिन्दुधर्ममें सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग ऐसे चार युग प्रवाहों का वर्णन है। भगवान श्री कृष्ण का जीवनकाल द्वापरयुग के अंतिम  वर्षो में  बिताया । द्वापरयुग में ८,६४,००० वर्ष माने गये हैं। भगवान श्री कृष्ण का जन्म द्वापर के ८,३२,८७५वे साल के श्रावण के कृष्णपक्ष की ८मी और बुधवार के दिन रोहीणी नक्षत्र के समय पर हुआ। अवतारी पुरूष श्री कृष्णने अपनी आयु के १२५ साल १ माह और ५ दिन इस पृथ्वी पर बिताये।

Big Bang

देखा जाए तो  सृष्टि का आरंभ एक बड़े धमाका से हुआ जिसे वैज्ञानिक लोग विग बैंग कहते हैं । बस उस ईश्‍वर की इच्‍छा थी कि संसार का निर्माण हो और सृष्टि बन गई । सर्वप्रथम उन परम पुरुष श्रीकृष्ण के दक्षिण पार्श्व से जगत के कारण रूप तीन मूर्तिमान गुण प्रकट हुए। उन गुणों से महत्‍व  अहंकार पांच तन्मात्राएं रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द ये पांच विषय क्रमशः प्रकट हुए। इसके उपरान्त ही श्रीकृष्ण से साक्षात भगवान नारायण का प्रादुर्भाव हुआ। जिनकी अंगकान्ति श्याम(सावली) थी, वे नित्य तरुण पीताम्बरधारी और विभिन्न वनमालाओं से विभूषित थे। उनकी चार भुजाएं थीं, उन भुजाओं में क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्म विराजमान थे। उनके मुखारबिन्द पर मंद-मंद मुस्कान की छटा छा रही थी। वे रत्नमय आभूषणों से विभूषित थे। शारंगधनुष धारण किए हुए थे।

कौस्तुभ मणि उनके वक्षस्थल की शोभा बढ़ा रही थी। श्रीवत्सभूषित वक्ष में साक्षात् लक्ष्मी का निवास था। वे श्रीनिधि अपूर्व शोभा को प्रस्तुत कर रहे थे। शरत्‌काल की पूर्णिमा के चंद्रमा की प्रभा से सेवित मुखचन्द्र के कारण वे मनोहर जान पड़ते थे। कामदेव की कान्ति से युक्त रूप-लावण्य उनके सौंदर्य को और भी बढ़ा रहा था। नारायण श्रीकृष्ण के समक्ष खड़े होकर दोनों हाथों को जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।

गीताजी में भी भगवान ने अर्जुन को बताया की ” मयाध्यक्षेण प्रकृतिम सूयते स चराचरम | “, अर्थात मेरी अध्यक्षता में प्रकृति समस्त चराचर जगत अर्थात सृष्टि की रचना करती है |

श्रीकृष्ण लीलाओं का जो विस्तृत वर्णन भागवत ग्रंथ मे किया गया है, उसका उद्देश्य क्या केवल कृष्ण भक्तों की श्रद्धा बढ़ाना है या मनुष्य मात्र के लिए इसका कुछ संदेश है? तार्किक मन को विचित्र-सी लगने वाली इन घटनाओं के वर्णन का उद्देश्य क्या ऐसे मन को अतिमानवीय पराशक्ति की रहस्यमयता से विमूढ़वत बना देना है अथवा उसे उसके तार्किक स्तर पर ही कुछ गहरा संदेश देना है, इस पर हमें विचार करना चाहिए।

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श्री कृष्ण एक ऐतिहासिक पुरुष हुए हैं, इसका स्पष्ट प्रमाण हमें छान्दोग्य उपनिषद के एक उल्लेख में मिलता है। वहां (3.17.6) कहा गया है कि देवकी पुत्र श्रीकृष्ण को महर्षिदेव:कोटी आंगिरस ने निष्काम कर्म रूप यज्ञ उपासना की शिक्षा दी थी, जिसे ग्रहण कर श्रीकृष्ण ‘तृप्त’ अर्थात पूर्ण पुरुष हो गए थे। श्रीकृष्ण का जीवन, जैसा कि महाभारत में वर्णित है, इसी शिक्षा से अनुप्राणित था और गीता में उसी शिक्षा का प्रतिपादन उनके ही माध्यम से किया गया है। किंतु इनके जन्म और बाल-जीवन का जो वर्णन हमें प्राप्त है वह मूलतः श्रीमद् भागवत का है और वह ऐतिहासिक कम, आध्यात्मिक अधिक है और यह बात ग्रंथ के आध्यात्मिक स्वरूप के अनुसार ही है। ग्रंथ में चमत्कारी भौतिक वर्णनों के पर्दे के पीछे गहन ध्यात्मिक संकेत छिपाए हैं।

श्रीमद्भागवत में सृष्टि की संपूर्ण विकास प्रक्रिया का और उस प्रक्रिया को गति देने वाली परमात्म शक्ति का दर्शन कराया गया है। ग्रंथ के पूर्वार्ध (स्कंध 1 से 9) में सृष्टि के क्रमिक विकास (जड़-जीव-मानव निर्माण) का और उत्तरार्ध (दशम स्कंध) में श्रीकृष्ण की लीलाओं के द्वारा व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास का वर्णन प्रतीक शैली में किया गया है। भागवत में वर्णित श्रीकृष्ण लीला के कुछ मुख्य प्रसंगों का आध्यात्मिक संदेश पहचानने का यहाँ प्रयास किया गया है।

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श्रीकृष्ण आत्म तत्व के मूर्तिमान् रूप हैं। मनुष्य में इस चेतन तत्व का पूर्ण विकास ही आत्म तत्व की जागृति है। जीवन प्रकृति से उद्भुत और विकसित होता है अतः त्रिगुणात्मक प्रकृति के रूप में श्रीकृष्ण की भी तीन माताएँ हैं। 1- रजोगुणी प्रकृतिरूप देवकी जन्मदात्री माँ हैं, जो सांसारिक माया गृह में कैद हैं। 2- सतगुणी प्रकृति रूपा माँ यशोदा हैं, जिनके वात्सल्य प्रेम रस को पीकर श्रीकृष्ण बड़े होते हैं। 3- इनके विपरीत एक घोर तमस रूपा प्रकृति भी शिशुभक्षक सर्पिणी के समान पूतना माँ है, जिसे आत्म तत्व का प्रस्फुटित अंकुरण नहीं सुहाता और वह वात्सल्य का अमृत पिलाने के स्थान पर विषपान कराती है। यहाँ यह संदेश प्रेषित किया गया है कि प्रकृति का तमस-तत्व चेतन-तत्व के विकास को रोकने में असमर्थ है।

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शिशु और बाल वय में ही श्रीकृष्ण द्वारा अनेक राक्षसों के वध की लीलाओं तथा सहज-सरल-हृदय मित्रों और ग्रामवासियों में आनंद और प्रेम बांटने वाली क्रीड़ाओं का विस्तृत वर्णन भागवत में हुआ है। शिशु चरित्र गोकुल में और बाल चरित्र वृंदावन में संपन्न होने का जो उल्लेख है, वह आध्यात्मिक अर्थ की ओर संकेत करता है।

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गो-शब्द का अर्थ इंद्रियाँ भी हैं, अतः गोकुल से आशय है हमारी पंचेद्रियों का संसार और वृंदावन का अर्थ है तुलसीवन अर्थात मन का उच्च क्षेत्र (तुरीयावस्था वाले ‘तुर’ से ‘तुरस’ और ‘तुलसी’ शब्द की व्युत्पत्ति व्याकरणसम्मत है)। गोकुल में पूतना वध, शकट भंजन और तृणावर्त वध का तथा वृंदावन में बकासुर, अधासुर और धेनुकासुर आदि अनेक राक्षसों के हनन का वर्णन है।

व्यक्ति और समाज को अपने अंदर व्याप्त आसुरी वृत्तियों के रूप में इनकी पहचान करना होगा तभी आध्यात्मिक-नैतिक शक्ति से इनका हनन संभव होगा और तब ही इस बालरूप श्रीकृष्ण का उद्भव महाभारत के सूत्रधार, धर्मस्थापक, श्रीकृष्ण के रूप में होना संभव होगा।

वृंदावन की कथाओं में कालिया नाग, गोवर्धन, रासलीला और महारास वाली कथाएँ अधिक प्रसिद्ध हैं। श्रीकृष्ण ने यमुना को कालिया नाग से मुक्त-शुद्ध किया था। यमुना, गंगा, सरस्वती नदियों को क्रमशः कर्म, भक्ति और ज्ञान की प्रतीक माना गया है। ज्ञान अथवा भक्ति के अभाव मेंकर्म का परिणाम होता है, कर्ता में कर्तापन के अहंकार-विष का संचय। यह अहंकार ही कर्म-नद यमुना का कालिया नाग है। सर्वात्म रूप श्रीकृष्ण भाव का उदय इस अहंकार-विष से कर्म और कर्ता की रक्षा करता है (गीता- 18.55.58)।

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गोवर्धन धारण कथा की आर्थिक, नीति-परक और राजनीतिक व्याख्याएं की गई हैं। इस कथा का आध्यात्मिक संकेत यह दिखता है कि गो अर्थात इंद्रियों का वर्धन (पालन-पोषण) कर्ता, अर्थात इंद्रियों में क्रियाशील प्राण-शक्ति के स्रोत परमेश्वर पर हमारी दृष्टि होना चाहिए। इसी प्रकार गोपियों के साथ रासलीला के वर्णन में मन की वृत्तियां ही गोपिकाओं के रूप में मूर्तिमान हुई हैं और प्रत्येक वृत्ति के आत्म-रस से सराबोर होने को रासलीला या रसनृत्य के रूप में चित्रित किया गया है। इससे भी उच्च अवस्था का- प्रेम और विरह के बाह्य द्वैत का एक आंतरिक आनंद में समाहित हो जाने की अवस्था का वर्णन ‘महारास’ में हुआ है।

श्रीकृष्ण को किशोर वय होते न होते कंस उन्हें मरवा डालने का एक बार फिर षड्यंत्र रचकर मथुरा बुलवाता है, किंतु श्रीकृष्ण उसको उसके महाबली साथियों सहित मार डालते हैं। कंस शब्द का अर्थ और उसकी कथा भी संकेत करती है कि कंस देहासक्ति का मूर्तिमान रूप है, जो संभावित मृत्यु से बचने के लिए कितने ही कुत्सित कर्म करता है। मथुरा का शब्दार्थ है- ‘विक्षुब्ध किया हुआ।’ अतः मथुरा है देहासक्ति से विक्षुब्ध मन। श्रीकृष्ण का कंस वध करने के उपरांत द्वारिका में राज्य स्थापना करने का अर्थ है कि आत्मभाव में प्रवेश के पूर्व देहासक्ति की समाप्ति आवश्यक है।

कंस वध के बाद श्रीकृष्ण समुद्र के भीतर द्वारिका का निर्माण करवाते हैं और वहां राज्य स्थापित करते हैं। इतिहास के महापुरुष श्रीकृष्ण द्वारा द्वारका नगर का समुद्र किनारे या द्वीप पर निर्माण करवाना और कालांतर में उसका समुद्र में डूब जाना (जिसके कुछ अवशेष अभी हाल में ही खोजे गए हैं) उस काल की वास्तविक घटना होगी, किंतु भागवत ने ‘समुद्र के अंदर’ द्वारिका निर्माण का वर्णन करके स्पष्टतः यहां उसका आध्यात्मिक रूपांतरण प्रस्तुत किया है।

द्वारिका शब्द में द्वार का अर्थ है- साधन, उपाय या प्रवेश मार्ग। समुद्र व्यक्तित्व के गहरे तल- आत्म क्षेत्र को इंगित करता है। अतः आत्म क्षेत्र का प्रवेश द्वार है द्वारिका। इस क्षेत्र में चेतना का प्रवेश होने पर जीवन जीने का जैसा स्वरूप होगा, उसका निरूपण द्वारिका पर श्रीकृष्ण राज्य के रूप में किया गया है। इस क्षेत्र का परिचय हमें महाभारत में श्रीकृष्ण के लोकहितार्थ और धर्मस्थापनार्थ किए गए कार्यों द्वारा तथा गीता के अंतर्गत उनकी वाणी द्वारा कराया गया है।

दुर्योधन ने श्री कृष्ण की पूरी नारायणी सेना मांग ली थी।

और अर्जुन ने केवल श्री कृष्ण को मांगा था।उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की चुटकी (मजाक) लेते हुए

कहा:

“हार निश्चित हैं तेरी, हर दम रहेगा उदास ।

माखन दुर्योधन ले गया, केवल छाछ बची तेरे पास ।”

अर्जुन ने कहा :- हे प्रभु

“जीत निश्चित हैं मेरी, दास हो नहीं सकता उदास ।

माखन लेकर क्या करूँ, जब माखन चोर हैं मेरे पास…!

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श्री कृष्‍ण का गीता ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है :

भगवान श्री कृष्‍ण नें कर्मव्यवस्था को सर्वोपरि माना, कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन को कर्मज्ञान देते हुए उन्होंने गीता की रचना की जो कलिकाल में धर्म में सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।

गीता में धर्म युद्ध की शिक्षा :

अर्जुन को जब रणभूमि में मोह हो जाता है कि मैं अपने भाई-बांधव को कैसे मारूँ तो भगवान श्रीकृष्‍ण कहते हैं :

कुतस्‍त्‍वा कश्‍मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।

अनार्यजुष्‍टमस्‍वर्ग्‍यमकीर्तिकरमअर्जुन     ।।

      श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन , तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्‍त हुआ क्‍योंकि यह न तो श्रेष्‍ठ पुरूषों द्वारा आचरित है, न स्‍वर्ग को देने वाला है न कीर्ति को करने वाला है। अध्‍याय 2, श्‍लोक 2, गीता।।

आगे श्री भगवान कहते हैं :

क्‍लैव्‍यं मा स्‍म गम: पार्थ नैतत्‍वय्युपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्‍यं त्‍यक्‍त्वोत्त्ष्ठि परन्‍तप।।

      इसलिए हे अर्जुन, नपुंसकता मत प्राप्‍त हो, तुझे यह उचित नहीं जान पड़ती। इसलिए हे परंतप, हृदय की तुच्‍छ दुर्बलता को छोड़कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ। अध्‍याय 2, श्‍लोक 3,  गीता।।

आत्‍मा की अमरता का संदेश :

      जब अर्जुन को शरीर विनष्‍ट होने की थोड़ी सी चिंता दिखी तब भगवान श्री कृष्‍ण नें अर्जुन को आत्‍मा के अविनाशी होने की बात बताई :

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृह्याति  नरोपराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-

न्‍यन्‍यानि संयाति नवानि देही ।।

नैनं छिन्‍दति शस्‍त्राणि नैनं दहति पावक: ।

न चैनं क्‍लेदयन्‍त्‍यापो न शोषयति मारूत: ।।

      जिस प्रकार मनुष्‍य पुराने वस्‍त्रों को त्‍यागकर दूसरे नये वस्‍त्रों को ग्रहण करता है वैसे ही जीवात्‍मा पुराने शरीरों को त्‍यागकर दूसरे नये शरीरों को ग्रहण करता है।

इस आत्‍मा को शस्‍त्र काट नहीं सकते, इसको आग जला नहीं सकती, इसको जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकता।  अध्‍याय 2, श्‍लोक 22-23,  गीता।।

भगवान कृष्‍ण नें गीता में कर्म करने पर जोर दिया है उसके फलों पर नहीं । यही निष्‍कामता ही सफलता का राज है ।

कर्मण्‍येवाधिकारस्‍ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संड.गोस्‍त्वकर्मणि ।।

      हे अर्जुन, तेरा कर्म करने का अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं । इसलिए तू कर्मों के फलों का हेतु मत हो और तेरी फलों में भी आसक्ति न हो ।